Wednesday, August 8, 2012

मुंबई में म्हाडा के भूखंडों का घोटाला

माननीयों की मनमानी: एक और ज़मीन घोटाला
महाराष्ट्र में घोटालों का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा. माननीयों के कारनामों की फेहरिस्त कितनी लंबी है, इसका अंदाज लगा पाना मुश्किल है. ऐसा लगता है कि घोटालों के मामले में राज्य सरकार किसी भी सूरत में केंद्र सरकार से पीछे नहीं रहना चाहती है. आदर्श सोसाइटी घोटाले के बाद फिर एक बड़ा ज़मीन घोटाला सामने आया है, महाराष्ट्र गृह निर्माण महामंडल की ज़मीन को कौड़ियों के दाम पर नेताओं को बांटने का. जब म्हाडा ने अपनी जमीनों की स्थिति पर अंतरिम जांच कराई तो इस बंदरबांट का खुलासा हुआ. इसमें भी नेताओं ने अपने सामाजिक एवं शैक्षणिक संगठनों के नाम पर आसानी से ज़मीन हथिया ली, पर उस ज़मीन का सामाजिक कार्यों की बजाय व्यवसायिक इस्तेमाल किया जा रहा है. 

महत्वपूर्ण बात यह है कि आवासीय निर्माण के लिए आरक्षित म्हाडा की ज़मीन को नेताओं में बांटे जाने का कार्य उन्हीं माननीयों के मुख्यमंत्रित्व काल में हुआ, जिनका नाम पहले से ही आदर्श सोसाइटी घोटाले में बार-बार आ रहा है. यहां बात हो रही है पूर्व मुख्यमंत्री एवं वर्तमान में केंद्रीय मंत्री विलासराव देशमुख एवं सुशील शिंदे की. इन दोनों की जब राज्य में सरकार थी, तब आवासीय निर्माण के लिए म्हाडा की आरक्षित ज़मीनों को मुक्त हाथों से नेताओं की संस्थाओं को बांट दिया गया, जिनमें से कुछ ज़मीन तो अब निजी कंपनियों द्वारा इस्तेमाल की जा रही है.

म्हाडा की ज़मीन सस्ते में देकर किया उपकृत
जिन नेताओं को म्हाडा की ज़मीन सस्ती दर पर देकर उपकृत किया गया, उनमें कांग्रेस विधायक मधुकर चव्हाण, कांग्रेस सांसद प्रिया दत्त, पूर्व श्रम मंत्री एवं राकांपा नेता नवाब मलिक, ग्राम्य विकास मंत्री एवं राकांपा नेता जयंत पाटिल और सपा नेता अबू आजमी आदि शामिल हैं. कांग्रेस के सुभाष चव्हाण, अजीत सावंत एवं समाजवादी पार्टी के नेता अबु आजमी की भागीदारी में जुहू में ज़मीन आवंटित की गई. प्रिया दत्त के नरगिस ट्रस्ट को अस्पताल के लिए ओशिवरा इलाके में 10 हज़ार वर्ग मीटर ज़मीन का आवंटन किया गया. 2007 के दिसंबर माह में रियायती दर पर इस ज़मीन की कीमत 21 करोड़ रुपये थी, पर ट्रस्ट के अनुनय-विनय पर कीमत घटाकर मात्र 11 करोड़ रुपये कर दी गई.

67 भूखंडों का मनमाना वितरण
मुंबई में आज लोगों को रहने के लिए घर नहीं मिल रहा है. आम लोगों को सस्ते में आवास उपलब्ध कराने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने महाराष्ट्र गृह निर्माण महामंडल का गठन किया था, लेकिन महामंडल इस उद्देश्य को पूरा करने में नाकाम रहा है. आज म्हाडा द्वारा निर्मित घरों की कीमतें आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गई हैं. म्हाडा का कारोबार भी एक कॉरपोरेट कंपनी की तरह हो गया है. म्हाडा के 67 भूखंडों का मनमाने तरीके से वितरण किया गया, जिन्हें आम लोगों के लिए आवास निर्माण हेतु आरक्षित किया गया था. इन सभी भूखंडों की कीमत तो करोड़ों में है, पर इनका वितरण कौड़ियों के भाव किया गया.

म्हाडा की अंतरिम रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 20 हेक्टेयर ज़मीन 1999 से 2003 के मध्य नेताओं और उनकी संस्थाओं को सरकार की उप समिति के मार्फत बांट दी गई. मजेदार बात यह है कि यह सारा काम उन नेताओं की सरकार के कार्यकाल में किया गया, जिनका नाम बार-बार जमीन घोटालों में आता रहा है यानी विलासराव देशमुख और सुशील शिंदे की सरकार के दौरान म्हाडा की आरक्षित ज़मीन का बंटवारा सारे नियम-कायदों को ताख पर रखकर किया गया. इससे यह बात एक बार फिर साफ हो जाती है कि हमारे सत्ताधीश अपनी बिरादरी के लोगों को उपकृत करने में किसी कानून को आड़े नहीं आने देते हैं, फिर मामला चाहे आदर्श सोसाइटी का हो या लवासा लेक सिटी का. हां, आम आदमी द्वारा मेहनत से कमाई गई पूंजी से एक आशियाना बनाने में सारे नियम-कायदे आड़े आने लगते हैं, लेकिन नेता तो सरकार ही बन जाते हैं और शासन-प्रशासन उनके हाथों की कठपुतली बन जाता है.

सत्ताधीशों नेताओं की ज़मीनों की बंदरबांट
यह राज्य की जनता का दुर्भाग्य नहीं तो क्या है कि एक ओर ज़मीन के अभाव में म्हाडा घरों का निर्माण नहीं कर पा रहा है. लोगों को रहने के लिए एक छोटा सा मकान नहीं मिल पा रहा है. जो मकान म्हाडा द्वारा बनाए जाते हैं, उनकी कीमत भी इतनी अधिक हो गई है कि सामान्य आदमी उन्हें ले नहीं पा रहा है. वहीं हमारे सत्ताधीश और नेता ज़मीनों की बंदरबांट बड़े आराम से कर रहे हैं.

कौन कौन हैं हमाम में नंगे
जिन नेताओं को म्हाडा की ज़मीन सस्ती दर पर देकर उपकृत किया गया, उनमें कांग्रेस विधायक मधुकर चव्हाण, कांग्रेस सांसद प्रिया दत्त, पूर्व श्रम मंत्री एवं राकांपा नेता नवाब मलिक, ग्राम्य विकास मंत्री एवं राकांपा नेता जयंत पाटिल और सपा नेता अबू आजमी आदि शामिल हैं. 

  • कांग्रेस के सुभाष चव्हाण, अजीत सावंत एवं समाजवादी पार्टी के नेता अबु आजमी की भागीदारी में जुहू में ज़मीन आवंटित की गई.
  • प्रिया दत्त के नरगिस ट्रस्ट को अस्पताल के लिए ओशिवरा इलाके में 10 हज़ार वर्ग मीटर ज़मीन का आवंटन किया गया. 2007 के दिसंबर माह में रियायती दर पर इस ज़मीन की कीमत 21 करोड़ रुपये थी, पर ट्रस्ट के अनुनय-विनय पर कीमत घटाकर मात्र 11 करोड़ रुपये कर दी गई.
  • नवाब मलिक की बेगम और बहन की सदस्यता वाले रहबर फाउंडेशन को सस्ती दर पर म्हाडा की ज़मीन का आवंटन किया गया.
  • मधुकर चव्हाण के रायगढ़ मिलिट्री स्कूल को भी सस्ती दर पर ज़मीन दी गई.
  • जयंत पाटिल के कोरेगांवएजूकेशन सोसाइटी को सारे नियम-कायदों को ताख पर रखकर म्हाडा के भूखंड काआवंटन किया गया. मजे की बात यह है कि सरकार की उप समिति में नवाब मलिक औरजयंत पाटिल सदस्य थे तो चव्हाण महाराष्ट्र गृह निर्माण महामंडल के अध्यक्षथे. मतलब यह है कि आपस में साठगांठ करके इन नेताओं ने म्हाडा की ज़मीनों काबंटवारा कर लिया. यह जनता की आंखों में धूल झोंकना नहीं तो और क्या है?

मध्यप्रदेश मित्र चेरिटेबल ट्रस्ट को 6.32 हजार वर्ग मीटर भूखंड
एक अन्य मामले में मध्य प्रदेश मित्र चेरिटेबल ट्रस्ट को भी 6 हजार 32 वर्ग मीटर का भूखंड रियायती दर पर 40 लाख रुपये में गोरेगांव इलाके में दिए जाने का उल्लेख रिपोर्ट में किया गया है. मित्र चेरिटेबल ट्रस्ट को उक्त ज़मीन स्कूल और खेल के मैदान के लिए दी गई थी. मित्र चेरिटेबल ट्रस्ट ने उक्त ज़मीन को दो भागों में विभाजित करके एक भाग एक निजी कंपनी को किराए पर व्यवसायिक इस्तेमाल के लिए दे दिया है. मित्र चेरिटेबल ट्रस्ट ऐसा करके सालाना ढाई करोड़ रुपये का मुनाफा कमा रहा है. इस संदर्भ में मुंबई उच्च न्यायालय में याचिका दायर की जा चुकी है, जो कि विचाराधीन है. सरकार की ज़मीन आवंटन नीति के नियमों के मुताबिक, रियल स्टेट डेवलपर को किसी भी सरकारी ज़मीन का आवंटन नहीं किया जा सकता है. इसके बावजूद म्हाडा की एक हज़ार वर्ग मीटर ज़मीन का आवंटन ब्ल्यू स्टार रियल्यटर्स को अंधेरी इलाके में किया गया. इसके साथ ही दिनशा टैपनैक्श बिल्डर को भी वर्सोवा में एक हज़ार वर्ग मीटर ज़मीन दी गई. इसी तरह सबसे अधिक 4 हेक्टेयर ज़मीन वर्सोवा में थ्री एम जिमखाना प्राइवेट लिमिटेड को मैग्रोव क्षेत्र से सटी हुई दी गई.

52 भूखंडों का आवंटन विलासराव ने किया
यह मामला उजागर होने के बाद पता चलता है कि राज्य सरकार ज़मीनों के बंटवारे के मामले में कितनी उदार है. उससे जिसकी निभ गई, उसे ज़मीन देने में वह कोई भी नियम-कानून आड़े नहीं आने देती है, फिर चाहे वह कोई हो, नेता हो, सामाजिक संस्था हो या बिल्डर हो या कोई और. सबको समान रूप से उपकृत करने की रीति-नीति सरकार ने ज़मीन देने के मामले में अपना रखी है, स़िर्फ शर्त यह है कि उसकी सरकार से निकटता हो. इसीलिए म्हाडा के 52 भूखंडों का आवंटन विलासराव देशमुख के मुख्यमंत्रित्व काल में किया गया. जब उनसे इस संदर्भ में पूछा गया तो उनका कहना था कि उन्हें कुछ याद नहीं है, यह मामला काफी पुराना है. वह म्हाडा के अध्यक्ष से कहेंगे कि रिपोर्ट की एक प्रति उन्हें भेजी जाए. यहां याद दिला दें कि विलासराव देशमुख ने तब भी यही कहा था, जब फिल्म निर्माता सुभाष घई के संस्थान को ज़मीन आवंटन करने का मामला सामने आया था. उस समय भी वह शुरुआत में यही कहकर बात को टालते रहे कि मामला बहुत पुराना है, उन्हें कुछ याद नहीं है, मगर बाद में उच्चतम न्यायालय ने भी नियम-कायदों को ताख पर रखकर सुभाष घई के संस्थान को ज़मीन आवंटित किए जाने के मामले में विलासराव देशमुख को पद का दुरुपयोग करने का दोषी करार दिया था. सुशील शिंदे तो अपनी मधुर मुस्कान बिखेर कर, बाजू बचाकर निकलने में ही अपनी भलाई समझते हैं, जबकि उनके मुख्यमंत्री रहते हुए म्हाडा के 15 भूखंडों का आवंटन किया गया, मगर वह अभी कुछ भी कहने के लिए तैयार नहीं हैं.

यह राज्य की जनता का दुर्भाग्य नहीं तो क्या है कि एक ओर ज़मीन के अभाव में म्हाडा घरों का निर्माण नहीं कर पा रहा है. लोगों को रहने के लिए एक छोटा सा मकान नहीं मिल पा रहा है. जो मकान म्हाडा द्वारा बनाए जाते हैं, उनकी कीमत भी इतनी अधिक हो गई है कि सामान्य आदमी उन्हें ले नहीं पा रहा है. वहीं हमारे सत्ताधीश और नेता ज़मीनों की बंदरबांट बड़े आराम से कर रहे हैं. नेताओं के संगठनों-संस्थाओं को बड़ी उदारता के साथ ज़मीनों का आवंटन किया जा रहा है. वहीं आम मुंबईकर अपने घर का सपना आंखों में पाले हुए वृद्धावस्था को प्राप्त हो जाता है, पर उसका वह सपना साकार नहीं हो पाता है. वह पूरी जिंदगी झोपड़पट्टी या फुटपाथ पर रहकर गुजारने के लिए मज़बूर रहता है.

इस रिपोर्ट के जरिए हुए खुलासे पर म्हाडा के अधिकारियों का कहना है कि जिन ज़मीनों पर नेताओं, उनकी संस्थाओं एवं अन्य लोगों का कब्जा है, उनकी अब ज़रूरत महसूस हो रही है. चूंकि म्हाडा निर्मित फ्लैटों की मांग बढ़ी है, इसके साथ ही ज़मीन की कमी को देखते हुए अब लगता है कि म्हाडा के मकानों के लिए निकाली गई लॉटरी की यह आखिरी खेप होगी. इसलिए नागरिकों की मांग को देखते हुए उक्त ज़मीन म्हाडा को वापस की जानी चाहिए. मगर क्या नेताओं के कब्जे से ज़मीन छुड़ाना आसान काम है?

नेता, बिल्डर या किसी प्रभावी संस्था का जिस सरकारी ज़मीन पर कब्जा हो जाता है, उसे वे आसानी से नहीं छोड़ते हैं. इसके लिए वे नीचे से ऊपर तक सारे राजनीतिक-कानूनी दांवपेंच लगा देते हैं. लिहाजा अदालती प्रक्रिया में सालों लग जाते हैं. फिर यह मामला तो सरकार के तहत किया गया है. वह भी इसमें अपना स्वार्थ देखेगी. इसका अर्थ यह हुआ कि सरकार की उदासीनता और असहयोग के चलते, कानूनी लड़ाई लड़े जाने के बावजूद उक्त ज़मीन कई सालों तक म्हाडा को वापस नहीं मिलने वाली है और तब तक हजारों नागरिकों को अपना घर होने का सपना पूरा करने के लिए इंतजार करना पड़ेगा.

साभार
प्रवीण महाजन, चौथी दुनिया, June 14th, 2012
http://www.chauthiduniya.com/2012/06/misters-arbitrary-another-land-scam.html

26 लाख करोड़ का कोयला महाघोटाला

सरकार चलाने का यह एक नया मूलमंत्र है. पहले घोटाला करो और भ्रष्टाचार होने दो. अगर मामला सामने आ जाए तो सबसे पहले उसे नकार दो, दलीलें दो, मीडिया में बयान दे दो कि घोटाला हुआ ही नहीं है. और, जब घोटाले का पर्दाफाश होने लग जाए, मामला हाथ से बाहर निकल जाए, जांच शुरू हो जाए, कोर्ट में मुकदमा चलने लगे तो कह दो कि मामले की जांच हो रही है. यह मामला कोर्ट में है और कोर्ट का फैसला आखिरी फैसला है. देश में कोर्ट का फैसला कितने दिनों में आता है, यह सबको पता है. तब तक देश की जनता भूल जाएगी कि कोई घोटाला भी हुआ था. बोफोर्स का उदाहरण हम सबके सामने है, लेकिन कोयला घोटाले की जांच सीवीसी ने सीबीआई को दे दी है. अब सीबीआई की जांच से क्या निकलेगा, यह बड़ा सवाल है. राजनेताओं पर चल रहे भ्रष्टाचार के मामलों की जांच में सीबीआई खरी नहीं उतरी है. सीबीआई का राजनीतिक इस्तेमाल नई बात नहीं है. वैसे भी पिछले घोटालों के नतीजों को देखते हुए लोगों को अब सीबीआई की जांच पर भरोसा नहीं है.


सरकार के चेहरे से नकाब उतर गया
कोयला घोटाले में प्रधानमंत्री का नाम क्या आया कि कांग्रेस पार्टी और सरकार इमोशनल हो गई. मनमोहन सिंह ने सीधे राजनीति छोड़ने की धमकी दे डाली. प्रधानमंत्री कार्यालय आरोपों के जवाब तलाशने में जुट गया. घोटाले की जांच की जगह दलील और बयान देकर मामले को निपटाने की कोशिश की गई. ठीक उसी तरह, जिस तरह 2-जी स्पैक्ट्रम घोटाले के खुलासे के बाद प्रधानमंत्री ने की थी. संसद के अंदर और संसद के बाहर इसी तरह से ए राजा के बचाव में बयान दिए थे. जब मामला कोर्ट पहुंचा तो सरकार के चेहरे से नकाब उतर गया. प्रधानमंत्री ने अभी तक देश को यह नहीं बताया कि तीन सालों तक उन्होंने ए राजा का क्यों बचाव किया. वैसे राजनीति में नैतिकता के लिए कोई जगह बची ही नहीं है, वरना राजनीतिक मर्यादा जिंदा होती तो 2-जी घोटाले में कई लोग स्वयं ही इस्तीफा दे देते. किसी को बयानबाजी करने की ज़रूरत नहीं पड़ती, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

एक बार फिर देश ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां हर दस्तावेज, हर रिपोर्ट और हर ज़िम्मेदार एजेंसी देश के सबसे बड़े घोटाले की ओर इशारा करते हैं. चौथी दुनिया ने सबसे पहले कोयला घोटाले का पर्दाफाश किया था. तबसे यह मामला राजनीतिक गलियारों में घूम रहा है, लेकिन अब सीएजी की लीक हुई रिपोर्ट से इसकी पुष्टि हो गई है. सरकार इस मामले को दबाना चाहती है. अगर सरकार की नीयत साफ है तो वह न्यायिक जांच या जेपीसी जांच क्यों नहीं कराती? लेकिन सरकार और उसके मंत्री-नेता बयानबाजी पर उतारू हैं. यह मामला 2-जी घोटाले से ज़्यादा गंभीर है, यह 2-जी घोटाले से कई गुना बड़ा है. इसमें शक की सुई सीधे प्रधानमंत्री पर जा टिकती है, क्योंकि कोयला खदानों की बंदरबांट सबसे ज़्यादा उस वक्त हुई, जब कोयला मंत्री स्वयं प्रधानमंत्री थे.

सरकार की दलीलें
अब जरा सरकार की दलीलों पर नज़र डालते हैं. प्रधानमंत्री कार्यालय ने दो सबसे महत्वपूर्ण तर्क दिए. दोनों ही तर्क हैरतअंगेज हैं. पहला यह कि कोयला खदानों के आवंटन का मकसद पैसा उगाहना नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था की विकास दर तेज करना था. दूसरा यह है कि कोयला खदानों को देश में मूलभूत सुविधाएं जुटाने और विकास के लिए आवंटित किया गया. आवंटन स़िर्फ ऐसी कंपनियों को किया जाना था, जिनका रिश्ता स्टील, बिजली और सीमेंट से है. सरकार कहती है कि यह घोटाला नहीं है, क्योंकि हमने उक्त कोयला खदानें स्टील, बिजली और सीमेंट कंपनियों को मुफ्त में इसलिए दी हैं, क्योंकि इससे विकास होगा.

सरकार भ्रष्टाचार की नई गाथा लिख रही है, घोटाले का नया मापदंड बना रही है. 26 लाख करोड़ रुपये की लूट हो गई, लेकिन सरकार कहती है कि यह घोटाला नहीं है. सीएजी की रिपोर्ट बता रही है कि कोयला घोटाला हुआ है, सरकार कहती है कि यह सरकार की नीति है. टीम अन्ना जब सरकार पर आरोप लगाती है तो सरकार कहती है कि यह आरोप आधारहीन है. सरकार के तर्क अज़ीबोगरीब हैं. अगर निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाना कोई घोटाला नहीं है, अगर नियमों का उल्लंघन करके प्राकृतिक संपदा की बंदरबांट घोटाला नहीं है तो सरकार को बताना चाहिए कि घोटाला आखिर होता क्या है? सरकार कह रही है कि कोयला घोटाला कोई घोटाला नहीं है. सरकार की दलीलों में दम नहीं है, क्योंकि चौथी दुनिया की तहकीकात बताती है कि यह घोटाला नहीं, बल्कि महाघोटाला है, दुनिया का सबसे बड़ा घोटाला. यह 26 लाख करोड़ रुपये का घोटाला है.

वैसे यह दलील वर्तमान कानून और उस वक्त संसद में लटके बिल के खिलाफ है, क्योंकि उसमें साफ-साफ लिखा है कि कोयला खदानों का आवंटन नीलामी के जरिए हो. अगर सरकार की दलील को ही मान लिया जाए, तब भी यह सवाल उठता है कि ऐसी कंपनियों को कोयला खदानें क्यों दी गईं, जिनका रिश्ता न तो बिजली से है, न स्टील से और न सीमेंट से. हैरानी इस पर है कि सरकार यह बात सामने नहीं ला रही है कि कई कंपनियों के आवंटन रद्द भी किए गए हैं. सरकार को यह बताना चाहिए कि उन कंपनियों के आवंटन क्यों रद्द किए गए.

कोयला सचिव के सुझावों को किया दरकिनार 
मतलब साफ है कि ऐसी कंपनियों को कोयला खदानें आवंटित की गईं, जो इसके योग्य नहीं थीं. जिस वक्त कोयला खदानों का आवंटन किया जा रहा था, उस वक्त इससे जुड़े लोगों को यह मालूम था कि इस पूरे मामले में गड़बड़ी हो रही है. यही वजह है कि कोयला सचिव लगातार प्रधानमंत्री कार्यालय को लिख रहे थे कि कोयला खदानों की नीलामी हो, लेकिन हर बार प्रधानमंत्री कार्यालय ने कोयला सचिव के सुझावों को दरकिनार कर दिया. अब प्रधानमंत्री कार्यालय ने यह फैसला किया है तो इस बात की जांच होनी चाहिए कि किस व्यक्ति या किस अधिकारी ने कोयला सचिव की राय को नामंजूर किया. देश को यह भी पता चलना चाहिए कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने यह फैसला किस कानून के तहत किया. वैसे प्रधानमंत्री कार्यालय की दलीलों का जवाब नहीं है. अब जब सरकार यह तय ही कर ले कि कोयला मुफ्त बांटने की नीति बना लेंगे तो घोटाला कहां से होगा. वैसे यह दलील सुनकर ए राजा, चिदंबरम एवं कपिल सिब्बल को ईर्ष्या हुई होगी. 2-जी घोटाले के बाद वे यह दलील देते रहे कि कोई नुकसान नहीं हुआ. कपिल सिब्बल जीरो लॉस की थ्योरी देते रहे, लेकिन न तो कोर्ट ने और न सीएजी उनकी बात सुनी. लेकिन इस बार जो दलील प्रधानमंत्री कार्यालय ने दी, उसमें घाटा उठाने को ही नीति बता दिया गया है. यह बताया गया है कि देश में विकास की गति को मजबूती देने के लिए कोयला खदानें मुफ्त बांटनी पड़ीं. ए राजा, चिदंबरम साहब एवं कपिल सिब्बल को लग रहा होगा कि काश, उन्होंने भी यह दलील दी होती कि देश में मोबाइल फोन के इस्तेमाल में तेजी लाने के लिए निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाना ज़रूरी था, तो आज बात इतनी आगे नहीं बढ़ी होती.

टीम अन्ना ने इस मामले को फिर से उठाकर सीधे प्रधानमंत्री पर हमला किया है. हमला भी ऐसा कि वह तिलमिला उठे और आनन-फानन में उन्होंने ऐसा बयान दे दिया, जिससे कई लोगों को उनसे सहानुभूति भी हुई. मनमोहन सिंह ने कहा कि अगर उन पर लगे आरोप सच साबित हुए तो वह सार्वजनिक जीवन से संन्यास ले लेंगे. मतलब यह कि राजनीति छोड़ देंगे. इस बयान को जो भी सुनेगा, उसे यही लगेगा कि इन आरोपों से मनमोहन सिंह को दु:ख पहुंचा है. लोगों को ज़रूर सहानुभूति हुई होगी, लेकिन सवाल यह है कि प्रधानमंत्री का दायित्व क्या है. कई मंत्रियों पर आरोप लगे हैं, कई मामलों की जांच हो रही है, 2-जी घोटाले में उनकी कैबिनेट का एक मंत्री जेल भी पहुंच गया. इससे एक बात तो यह साबित होती है कि प्रधानमंत्री ने जानबूझ कर या फिर अनजाने में सरकार के नीति निर्धारण में ऐसी कोई भूमिका नहीं निभाई, जिससे घोटालों और भ्रष्टाचार पर रोक लगाई जा सके. क्या प्रधानमंत्री का दायित्व स़िर्फ स्वयं के प्रति है. सही तो तब होता, जब प्रधानमंत्री यह कहते कि उनकी कैबिनेट के किसी भी मंत्री पर कोई आरोप सच साबित हुआ तो वह सार्वजनिक जीवन से संन्यास ले लेंगे. लगता है, भारत की राजनीति का मिजाज बदल गया है. प्रधानमंत्री जी वहां राजनीतिक नैतिकता का नया अध्याय लिख रहे हैं, जहां प्रधानमंत्री का अपनी कैबिनेट और सरकार के प्रति कोई दायित्व नहीं है, बल्कि वह स्वयं के लिए ही जवाबदेह है. इसके बावजूद कोयला घोटाले में जो प्रतिक्रिया प्रधानमंत्री और कोयला मंत्रालय ने दी है, वह शायद पर्याप्त नहीं है.

कोयला घोटाला देश का अब तक का सबसे बड़ा घोटाला है. चौथी दुनिया ने सबसे पहले इस घोटाले का पर्दाफाश किया था. हमने संबंधित दस्तावेज, संसदीय कमेटी की रिपोर्ट, कोयला खदानों में कोयला भंडारों के विवरण के साथ-साथ आवंटन से फायदा उठाने वाली कंपनियों की सूची भी प्रकाशित की थी.

हमारी तहकीकात के मुताबिक, देश को इस घोटाले की वजह से 26 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है. लेकिन हाल में कुछ अखबारों ने सीएजी की लीक हुई रिपोर्ट छापी, जिसके मुताबिक, सरकार ने जिस तरह कोयला खदानों की बंदरबांट की है, उससे देश को 10.67 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है. यह 2-जी स्पैक्ट्रम के आवंटन में हुए नुकसान से छह गुना ज़्यादा है. लेकिन सरकार और मीडिया के कुछ पंडितों का कुतर्क देखिए, जो कहते हैं कि यह कोई घोटाला नहीं है. सरकार कहती है कि कोयला या कोई भी प्राकृतिक संपदा निजी कंपनियों को मुफ्त देने और उन्हें फायदा पहुंचाने से कोई घोटाला साबित नहीं होता. इस तर्क के मुताबिक, अगर सरकार यह तय कर लेती है कि कोयला मुफ्त ही बांट देना है और इस नीति से अगर सरकारी खजाने को नुकसान होता है तो भी चिंता करने की बात नहीं है. इसे घोटाला नहीं माना जाएगा. सरकार का यह तर्क सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का उल्लंघन है, जिसमें कहा गया था कि किसी भी प्राकृतिक संपदा के आवंटन के लिए सरकार को नीलामी करनी चाहिए. सरकार के इस तर्क का दूसरा पहलू यह है कि अगर वह किसी प्राकृतिक संपदा को निजी कंपनियों को मुफ्त देने का फैसला करती है तो आवंटन की प्रक्रिया न्यायसंगत और पारदर्शी होनी चाहिए.

अब सवाल यह उठता है कि जिस तरह निजी कंपनियों को कोयला खदानों का आवंटन किया गया, क्या वह न्यायसंगत है और पारदर्शिता के मापदंड पर कितना खरा उतरता है? 2004 से 2009 तक कोयला खदानों का आवंटन एक स्क्रीनिंग कमेटी देख रही थी, जिसका संचालन कोयला सचिव कर रहे थे. हम पहले ही इस कमेटी के क्रियाकलापों के बारे में बता चुके हैं कि किस तरह वहां मनमर्जी से काम हो रहा था.

कोयला सचिव लगातार इस बात के लिए पत्र लिख रहे थे कि कोयला आवंटन नीलामी के जरिए हो, लेकिन सरकार अब कह रही है कि यह एक नीतिगत फैसला था कि स्टील, बिजली और सीमेंट कंपनियों को देश का विकास करने के लिए कोयला खदानें मुफ्त बांट दी जाएं. अब सवाल यह उठता है कि इस नीति के बारे में क्या कोयला सचिव को पता नहीं था? इस नीति का फैसला कैबिनेट ने ही लिया होगा तो अब तक सरकार ने कैबिनेट के उस फैसले को सामने क्यों नहीं रखा और उस फैसले के बारे में कोयला सचिव को क्यों नहीं बताया गया? इसका मतलब यह है कि इस सरकार के अधिकारियों के बीच, प्रधानमंत्री और अधिकारियों के बीच कोई समन्वय नहीं है. अगर यह नीतिगत फैसला था तो कोयला सचिव की चिट्ठी के जवाब में कोई चिट्ठी क्यों नहीं लिखी गई? सरकार की कोयला खदान मुफ्त बांटने की नीति क्या दिमाग की उपज है? कहीं ऐसा तो नहीं कि ऐसी कोई नीति ही न हो औैर घोटाले का पर्दाफाश होने के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारी इस नीति के बहाने घोटाले पर पर्दा डालना चाह रहे हैं. यह फैसला कहां हुआ, कैसे हुआ, अगर सरकार 3 दिनों के भीतर इस फैसले से जुड़े दस्तावेज सामने नहीं लाती है तो इसका मतलब यही है कि सरकार की पूरी थ्योरी झूठी है. हैरानी तो तब होती है, जब कोयला आवंटन की पूरी प्रक्रिया 2-जी स्पैक्ट्रम के आवंटन की तरह संदिग्ध दिखाई पड़ती है, जहां उक्त कंपनियां अपना शेयर विदेशी कंपनियों के हाथों बेचकर मुनाफा कमाने में जुट गईं. लेकिन अब सवाल स़िर्फ आवंटन की प्रक्रिया में गड़बड़ी का नहीं है, बल्कि प्रधानमंत्री का है.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर सवाल इसलिए उठ रहे हैं, क्योंकि 2006 से 2009 के दौरान जब वह कोयला मंत्री थे, तब कोयला खदानों के आवंटन में ज़रूरत से ज़्यादा तेजी आई. कोयला खदानों के आवंटन में प्रधानमंत्री कार्यालय की काफी सक्रिय भूमिका रही. कोयले से प्रधानमंत्री कार्यालय के रिश्ते ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. इस साल मार्च के महीने में प्रधानमंत्री कार्यालय के फैसले की वजह से कोल इंडिया की कीमत पर एक निजी कंपनी को सीधा फायदा पहुंचाया गया. कोल इंडिया का 90 फीसदी स्वामित्व भारत सरकार के पास है. प्रधानमंत्री पर आरोप है कि उन्होंने निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल किया, जो प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट के सेक्शन 13 के तहत आता है. इस कानून के तहत किसी भी सरकारी अधिकारी को दंडित किया जा सकता है. इससे कोई मतलब नहीं है कि उसने खुद पैसे लिए या नहीं. इसलिए प्रधानमंत्री ने पैसे लिए या नहीं लिए, उसका कोई मतलब नहीं रह जाता है.

बात केवल इतनी है कि क्या प्रधानमंत्री या प्रधानमंत्री कार्यालय के किसी भी फैसले से सरकार को नुकसान और किसी निजी कंपनी को फायदा पहुंचा या नहीं. इसलिए प्रधानमंत्री का यह कहना कि मैं ईमानदार हूं, इसका कोई मायने नहीं है. प्रधानमंत्री अकेले व्यक्ति नहीं है, जिन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया है. इसलिए बेहतर तो यही है कि सरकार पर लगे सारे आरोपों की न्यायिक जांच या जेपीसी जांच हो, ताकि दूध का दूध  और पानी का पानी हो सके. सबसे अहम सवाल यह है कि प्रधानमंत्री और यूपीए सरकार की दरियादिली स़िर्फ निजी कंपनियों के लिए क्यों है? गरीबों, किसानों एवं मज़दूरों के लिए सरकारी खजाना बंद क्यों होता जा रहा है, क्या इस देश में गरीब होना पाप हो गया है?

कुछ सवाल
  • जब सरकार ने 2006 में यह वादा किया था कि जब तक नया कानून नहीं पास हो जाता, तब तक कोयला खदानों का आवंटन नहीं किया जाएगा. तो फिर ऐसा क्यों हुआ?
  • नए कानून के मुताबिक, कोयला खदानों का आवंटन नीलामी के जरिए होना है तो फिर इस कानून को 2010 तक क्यों लटका कर रखा गया?
  • एक तऱफ कानून को लटका कर रखा गया, दूसरी तऱफ तेजी से निजी कंपनियों को कोयला खदानें बांट दी गईं.
  • सरकार ने ऐसी कंपनियों को कोयला खदानें आवंटित कीं, जो इसके योग्य नहीं थीं.
  • कोयला खदानों की नीलामी हो, कोयला सचिव के इस सुझाव को प्रधानमंत्री कार्यालय ने क्यों नज़रअंदाज किया?
  • कई कंपनियां कोयला खदानें और कोयला मुनाफा कमाकर बेच रही हैं, क्या यह सरकारी नियमों का उल्लंघन नहीं है?
  • 1993 से लेकर 2010 तक कोयले के 208 ब्लॉक बांटे गए, जो कि 49.07 बिलियन टन कोयला था. इनमें से 113 ब्लॉक निजी क्षेत्र में 184 निजी कंपनियों को दिए गए, जो कि 21.69 बिलियन टन कोयला था.
  • अगर बाज़ार मूल्य पर इसका आकलन किया जाए तो 2500 रुपये प्रति टन के हिसाब से इस कोयले का मूल्य 5,382,830.50 करोड़ रुपये होता है. अगर इसमें से 1250 रुपये प्रति टन काट दिया जाए, यह मानकर कि 850 रुपये उत्पादन की क़ीमत है और 400 रुपये मुनाफ़ा, तो भी देश को लगभग 26 लाख करोड़ रुपये का राजस्व घाटा हुआ.
  • 2006 से 2009 के बीच 17 बिलियन टन कोयला निजी कंपनियों को दिया गया. सीबीआई के मुताबिक, अगर इसे 50 रुपये प्रति टन की न्यूनतम दर से बेचा गया होता तो 8,50,000 करोड़ रुपये का फायदा होता.
  • बाज़ार में कोयले की क़ीमत 2500 रुपये प्रति टन है. 2006 से 2009 के बीच आवंटित कोयले को अगर इस दर पर बेचा गया होता तो देश को 42 लाख 50 हज़ार करोड़ रुपये का फायदा होता.

26 लाख करोड़ का महाघोटाला
यह बात है 2006-2007 की, जब शिबू सोरेन जेल में थे और प्रधानमंत्री ख़ुद ही कोयला मंत्री थे. उस दौरान दासी नारायण और संतोष बागडोदिया राज्यमंत्री थे. प्रधानमंत्री के नेतृत्व में कोयले के संशोधित क्षेत्रों को निजी क्षेत्र में सबसे अधिक तेजी से बांटा गया. सबसे बड़ी बात यह है कि ये कोयले की खानें स़िर्फ 100 रुपये प्रति टन की खनिज रॉयल्टी के एवज़ में बांट दी गईं. ऐसा तब किया गया, जब कोयले का बाज़ार मूल्य 2000 रुपये प्रति टन के ऊपर था. 

जब संसद में इस बात को लेकर कुछ सांसदों ने हंगामा किया, तब शर्मसार होकर सरकार ने कहा कि माइंस और मिनरल डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन एक्ट 1957 में संशोधन किया जाएगा और तब तक कोई भी कोयला खदान आवंटित नहीं की जाएगी. 2006 में यह बिल राज्यसभा में पेश किया गया और यह माना गया कि जब तक दोनों सदन इसे मंजूरी नहीं दे देते और यह बिल पास नहीं हो जाता, तब तक कोई भी कोयला खदान आवंटित नहीं की जाएगी, लेकिन यह विधेयक चार साल तक लोकसभा में जानबूझ कर लंबित रखा गया और 2010 में ही यह क़ानून में तब्दील हो पाया. इस दरम्यान संसद में किए गए वादे से सरकार मुकर गई और कोयले के ब्लॉक बांटने का गोरखधंधा चलता रहा. 

असल में इस विधेयक को लंबित रखने की राजनीति बहुत गहरी थी. इस विधेयक में साफ़-साफ़ लिखा था कि कोयले या किसी भी खनिज की खदानों के लिए सार्वजनिक नीलामी की प्रक्रिया अपनाई जाएगी. अगर यह विधेयक लंबित न रहता तो सरकार अपने चहेतों को मुफ्त कोयला कैसे बांट पाती. इस समयावधि में लगभग 21.69 बिलियन टन कोयले के उत्पादन क्षमता वाली खदानें निजी क्षेत्र के दलालों और पूंजीपतियों को मुफ्त दे दी गईं. इस दरम्यान प्रधानमंत्री भी कोयला मंत्री रहे और सबसे आश्चर्य की बात यह है कि उन्हीं के कार्यकाल में सबसे अधिक कोयले के ब्लॉक बांटे गए. ऐसा क्यों हुआ? प्रधानमंत्री ने हद कर दी, जब उन्होंने कुल 63 ब्लॉक बांट दिए. इन चार सालों में लगभग 175 ब्लॉक आनन-फानन में पूंजीपतियों और दलालों को मुफ्त में दे दिए गए.

चौथी दुनिया ने पता लगाने की कोशिश की कि इस घोटाले से देश को कितना घाटा हुआ. जो परिणाम सामने आया, वह स्तब्ध कर देने वाला है. दरअसल निजी क्षेत्र में कैप्टिव (संशोधित) ब्लॉक देने का काम 1993 से शुरू किया गया. 1993 से लेकर 2010 तक कोयले के 208 ब्लॉक बांटे गए, जो कि 49.07 बिलियन टन कोयला था. इनमें से 113 ब्लॉक निजी क्षेत्र में 184 निजी कंपनियों को दिए गए, जो कि 21.69 बिलियन टन कोयला था. अगर बाज़ार मूल्य पर इसका आकलन किया जाए तो 2500 रुपये प्रति टन के हिसाब से इस कोयले का मूल्य 5,382,830.50 करोड़ रुपये होता है. अगर इसमें से 1250 रुपये प्रति टन काट दिया जाए, यह मानकर कि 850 रुपये उत्पादन की क़ीमत है और 400 रुपये मुनाफ़ा, तो भी देश को लगभग 26 लाख करोड़ रुपये का राजस्व घाटा हुआ.

ऐसे हुई नियमों की अनदेखी
सरकारी नियमों के अनुसार, कोयले के ब्लॉक आवंटित करने के लिए भी कुछ नियम हैं, जिनकी साफ़ अनदेखी कर दी गई. ब्लॉक आवंटन के लिए कुछ सरकारी शर्तें होती हैं, जिन्हें किसी भी सूरत में अनदेखा नहीं किया जा सकता. ऐसी ही एक शर्त यह है कि जिन खदानों में कोयले का खनन सतह के नीचे होना है, उनमें आवंटन के 36 माह बाद (और यदि वन क्षेत्र में ऐसी खदान है तो यह अवधि छह महीने बढ़ा दी जाती है) खनन प्रक्रिया शुरू हो जानी चाहिए.

सरकार और बिचौलियों एवं फर्ज़ी कंपनियों के बीच क्या साठगांठ है, यह समझने के लिए रॉकेट साइंस पढ़ना ज़रूरी नहीं है. अगर ऐसा न होता तो आज 208 ब्लॉकों में से स़िर्फ 26 में उत्पादन हो रहा हो, ऐसा भी न होता. इसके बावजूद अगर कोयला मंत्री यह कहते हैं कि कोयले के आवंटन में कोई अनियमितताएं नहीं बरती गईं, कोई घोटाला नहीं हुआ है तो भला उनकी बातों पर कौन विश्वास करेगा?

यदि खदान ओपन कास्ट किस्म की है तो यह अवधि 48 माह की होती है (जिसमें अगर वन क्षेत्र हो तो पहले की तरह ही छह महीने की छूट मिलती है). अगर इस अवधि में काम शुरू नहीं होता है तो खदान मालिक का लाइसेंस रद्द कर दिया जाता है. समझने वाली बात यह है कि इस प्रावधान को इसलिए रखा गया है, ताकि खदान और कोयले का उत्खनन बिचौलियों के हाथ न लगे, जो सीधे-सीधे तो कोयले का काम नहीं करते, बल्कि खदान ख़रीद कर ऐसे व्यापारियों या  उद्योगपतियों को बेच देते हैं, जिन्हें कोयले की ज़रूरत है. इस गोरखधंधे में बिचौलिए मुंहमांगे और अनाप-शनाप दामों पर खदानें बेच सकते हैं. लेकिन सरकार ने ऐसी कई खदानों का लाइसेंस रद्द नहीं किया, जो इस अवधि के भीतर उत्पादन शुरू नहीं कर पाईं. ऐसा इसलिए, क्योंकि आवंटन के समय बहुत बड़ी मात्रा में ऐसे ही बिचौलियों को खदानें आवंटित की गई थीं, ताकि वे उन्हें आगे चलकर उद्योगपतियों को आसमान छूती क़ीमतों पर बेच सकें. 

2003 तक 40 ब्लॉक बांटे गए थे, जिनमें अब तक स़िर्फ 24 ने उत्पादन शुरू किया है. तो बाक़ी 16 कंपनियों के लाइसेंस रद्द क्यों नहीं किए गए? 2004 में 4 ब्लॉक बांटे गए थे, जिनमें आज तक उत्पादन शुरू नहीं हो पाया. 2005 में 22 ब्लॉक आवंटित किए गए, जिनमें आज तक केवल 2 ब्लॉकों में ही उत्पादन शुरू हो पाया है. इसी तरह 2006 में 52, 2007 में 51, 2008 में 22, 2009 में 16 और 2010 में एक ब्लॉक का आवंटन हुआ, लेकिन 18 जनवरी, 2011 तक की रिपोर्ट के अनुसार, कोई भी ब्लॉक उत्पादन शुरू होने की अवस्था में नहीं है. पहले तो बिचौलियों को ब्लॉक मुफ्त दिए गए, जिसके लिए माइंस और मिनरल एक्ट में संशोधन को लोकसभा में चार साल तक रोके रखा गया. फिर जब इन बिचौलियों की खदानों में उत्पादन शुरू नहीं हुआ (क्योंकि ये उत्पादन के लिए आवंटित ही नहीं हुई थीं), तो भी इनके लाइसेंस रद्द नहीं किए गए. 

सरकार और बिचौलियों एवं फर्ज़ी कंपनियों के बीच क्या साठगांठ है, यह समझने के लिए रॉकेट साइंस पढ़ना ज़रूरी नहीं है. अगर ऐसा न होता तो आज 208 ब्लॉकों में से स़िर्फ 26 में उत्पादन हो रहा हो, ऐसा भी न होता. इसके बावजूद अगर कोयला मंत्री यह कहते हैं कि कोयले के आवंटन में कोई अनियमितताएं नहीं बरती गईं, कोई घोटाला नहीं हुआ है तो भला उनकी बातों पर कौन विश्वास करेगा?

साभार 
डा. मनीष कुमार, चौथी दुनिया, June 15th, 2012
डॉ. मनीष कुमार राजनीतिक-सामजिक मसलों पर मौलिक विचार और उसके धारदार विश्लेषण के माहिर हैं. अपनी नेतृत्व क्षमता के साथ चौथी दुनिया में संपादक (समन्वय) का दायित्व संभाल रहे हैं.

http://www.chauthiduniya.com/2012/06/26-lakh-crore-coal-scam-this-is-not-a-scandal-is-mahagotala.html




चौथी दुनिया की रिपोर्ट सच साबित हुई : कोयला घोटाले का सच

चौथी दुनिया ने अप्रैल 2011 में कोयला घोटाले का पर्दा़फाश किया था. उस व़क्त न सीएजी रिपोर्ट आई थी, न किसी ने यह सोचा था कि इतना बड़ा घोटाला भी हो सकता है. उस व़क्त इस घोटाले पर किसी ने विश्वास नहीं किया. जिन्हें विश्वास भी हुआ तो आधा अधूरा हुआ. चौथी दुनिया ने आपसे अप्रैल 2011 में जो बातें कहीं, उस पर वह आज भी अडिग है.

हमारी तहक़ीक़ात के मुताबिक़, यह कोयला घोटाला कम से कम 26 लाख करोड़ रुपये का है और यह इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला है. संसद में जो हंगामा मचा, उसकी वजह यह थी कि एक अंग्रेजी अ़खबार ने सीएजी की रिपोर्ट को छाप दिया. सीएजी इस रिपोर्ट में घोटाले की बात करती है, लेकिन उसने घोटाले की रक़म कम बताई है. सीएजी की लीक रिपोर्ट के मुताबिक़, यह घोटाला दस लाख सत्तर हज़ार करोड़ रुपये का है, लेकिन सरकार की तऱफ से यह खबर दी गई कि सीएजी खुद अपनी रिपोर्ट पर क़ायम नहीं है और जो खबर छपी है, वह झूठी है. सीएजी की एक चिट्ठी का हवाला देकर प्रधानमंत्री कार्यालय ने यह खबर फैलाई. मज़ेदार बात यह है कि अगले ही दिन इस सीएजी की पूरी सच्चाई बाहर आ गई, जिसका निष्कर्ष यही निकलता है कि सीएजी ने घोटाले से इंकार नहीं किया है. वैसे समझने वाली बात यह है कि इस घोटाले के बारे में सभी पार्टियों को पहले से पता है, लेकिन फिर भी वे खामोश रहीं. अ़खबार में सीएजी की रिपोर्ट छपते ही मामले ने तूल पकड़ा और संसद में शोर शराबा शुरू हो गया.

सीएजी की रिपोर्ट से एक बात यह साबित होती है कि चौथी दुनिया ने जो अप्रैल 2011 में कोयला घोटाले का पर्दा़फाश किया, वह सच है. हालांकि देश की तथाकथित मुख्य धारा का मीडिया अब भी तटस्थ बैठा है. वह तय नहीं कर पा रहा है कि घोटाला है भी या नहीं. और अगर घोटाला है तो फिर कितने का है.

कोयले को काला सोना कहा जाता है, काला हीरा कहा जाता है, लेकिन सरकार ने इस हीरे की बंदरबांट कर डाली और अपने प्रिय-चहेते पूंजीपतियों एवं दलालों को मुफ्त ही दे दिया. अगर 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला देश के सभी घोटालों की जननी है तो जिस घोटाले का चौथी दुनिया ने पर्दा़फाश किया है, वह देश में हुए अब तक के सभी घोटालों का पितामह है. देश में कोयला आवंटन के नाम पर क़रीब 26 लाख करोड़ रुपये की लूट हुई है. सीएजी की जो रिपोर्ट लीक हुई है और जिस तरह संसद में हंगामा हुआ, उससे यह साबित होता है कि चौथी दुनिया की रिपोर्ट सही थी.

यह बात है 2006-07 की, जब शिबू सोरेन जेल में थे और सरकार त़ेजी से कोयला खदानों को मुफ्त बांटने लगी थी. सबसे बड़ी बात यह है कि ये कोयले की खानें स़िर्फ 100 रुपये प्रति टन की खनिज रॉयल्टी के एवज में बांट दी गईं. मतलब यह कि पहले मुफ्त में खदानें दे दी गईं, फिर इन खदानों से कोयला निकालने के बाद 100 रुपये प्रति टन के रेट से सरकार को पैसे मिलने का प्रावधान बनाया गया. ऐसा तब किया गया, जब कोयले का बाज़ार मूल्य 1800 से 2000 रुपये प्रति टन के ऊपर था. जब संसद में इस बात को लेकर कुछ सांसदों ने हंगामा किया, तब शर्मसार होकर सरकार ने कहा कि माइंस और मिनरल (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट 1957 में संशोधन किया जाएगा और तब तक कोई भी कोयला खदान आवंटित नहीं की जाएगी.

2006 में यह बिल राज्यसभा में पेश किया गया और यह माना गया कि जब तक दोनों सदन इसे म़ंजूरी नहीं दे देते और यह बिल पास नहीं हो जाता, तब तक कोई भी कोयला खदान आवंटित नहीं की जाएगी, लेकिन यह विधेयक चार साल तक लोकसभा में जानबूझ कर लंबित रखा गया और 2010 में ही यह क़ानून में तब्दील हो पाया. इस दौरान देश के सबसे बड़े घोटाले को अंजाम दिया गया. संसद में किए गए वादे से सरकार मुकर गई और कोयला खदान बांटने का गोरखधंधा चलता रहा. असल में इस विधेयक को लंबित रखने की राजनीति बहुत गहरी थी. यह नेताओं, अधिकारियों एवं उद्योगपतियों की बहुत बड़ी साज़िश है. इस विधेयक में साफ़-साफ़ लिखा था कि कोयले या किसी भी खनिज की खदानों के लिए सार्वजनिक नीलामी की प्रक्रिया अपनाई जाएगी. अगर यह विधेयक 2006 में ही पास हो जाता तो 26 लाख करोड़ रुपये नुक़सान नहीं होता. सरकार अपने चहेते पूंजीपतियों को मुफ्त कोयला नहीं बांट पाती. इस समयावधि में लगभग 21.69 बिलियन टन कोयले के उत्पादन क्षमता वाली खदानें निजी क्षेत्र के दलालों और पूंजीपतियों को मुफ्त दे दी गईं. कुल 63 ब्लॉक बांट दिए गए. इन चार सालों में लगभग 175 ब्लॉक आनन-फानन में पूंजीपतियों और दलालों को मुफ्त में दे दिए गए.

वैसे बाहर से देखने में इस घोटाले की असलियत सामने नहीं आती, इसलिए हमने यह पता लगाने की कोशिश की कि इस घोटाले से देश को कितना घाटा हुआ है. जो परिणाम सामने आया, वह चौंकाने वाला था. दरअसल, निजी क्षेत्र में कैप्टिव (संशोधित) ब्लॉक देने का काम 1993 से शुरू किया गया. कहने को ऐसा इसलिए किया गया कि कुछ कोयला खदानें खनन की दृष्टि से सरकार के लिए आर्थिक रूप से कठिन कार्य सिद्ध होंगी. इसलिए उन्हें निजी क्षेत्र में देने की ठान ली गई. ऐसा कहा गया कि मुना़फे की लालसा में निजी उपक्रम इन दूरदराज़ की और कठिन खदानों को विकसित कर लेंगे और देश के कोयला उत्पादन में वृद्धि हो जाएगी.

1993 से लेकर 2010 तक कोयले के 208 ब्लॉक बांटे गए, जो कि 49.07 बिलियन टन कोयला था. इनमें से 113 ब्लॉक निजी क्षेत्र में 184 निजी कंपनियों को दिए गए, जो कि 21.69 बिलियन टन कोयला था. अगर बाज़ार मूल्य पर इसका आकलन किया जाए तो 2500 रुपये प्रति टन के हिसाब से इस कोयले का मूल्य 5,382,830.50 करोड़ रुपये निकलता है. अगर इसमें से 1250 रुपये प्रति टन काट दिया जाए, यह मानकर कि 850 रुपये उत्पादन की क़ीमत है और 400 रुपये मुनाफ़ा, तो भी देश को लगभग 26 लाख करोड़ रुपये का राजस्व घाटा हुआ. सबसे बड़ी बात है कि यह घोटाला सरकारी फाइलों में दर्ज है और सरकार के ही आंकड़े ची़ख-ची़खकर कह रहे हैं कि यह घोटाला इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला है.

चौथी दुनिया ने एक साल पहले जो कोयला घोटाले का पर्दा़फाश किया, उसे सीएजी की रिपोर्ट ने सही ठहराया है. 2006 में कोल ब्लॉक के आवंटन को लेकर संसद में हंगामा हुआ था. इसके बाद सरकार ने संसद और लोगों को गुमराह करने का काम किया. सरकारी विधेयक लाने की बात कही गई, जिसके तहत यह नीलामी की जा सकेगी, लेकिन यह विधेयक चार साल तक लोकसभा में लंबित रखा गया, ताकि सरकार के जिन निजी खिलाड़ियों के साथ काले संबंध हैं, उन्हें इस दरम्यान कोयले के ब्लॉक जल्दी-जल्दी बांटकर ख़त्म कर दिए जाएं. इसमें कितनी रकम का लेन-देन हुआ होगा, यह ज़ाहिर सी बात है, लेकिन अनियमितताएं यहीं ख़त्म नहीं हो जातीं. इस घोटाले से जुड़े कई सवाल हैं

चौथी दुनिया ने एक साल पहले जो कोयला घोटाले का पर्दा़फाश किया, उसे सीएजी की रिपोर्ट ने सही ठहराया है. 2006 में कोल ब्लॉक के आवंटन को लेकर संसद में हंगामा हुआ था. इसके बाद सरकार ने संसद और लोगों को गुमराह करने का काम किया. सरकारी विधेयक लाने की बात कही गई, जिसके तहत यह नीलामी की जा सकेगी, लेकिन यह विधेयक चार साल तक लोकसभा में लंबित रखा गया, ताकि सरकार के जिन निजी खिलाड़ियों के साथ काले संबंध हैं, उन्हें इस दरम्यान कोयले के ब्लॉक जल्दी-जल्दी बांटकर ख़त्म कर दिए जाएं. इसमें कितनी रक़म का लेन-देन हुआ होगा, यह ज़ाहिर सी बात है, लेकिन अनियमितताएं यहीं ख़त्म नहीं हो जातीं. इस घोटाले से जुड़े कई सवाल हैं. सरकार की नीयत पर इसलिए सवाल उठ रहे हैं कि उससे कई सारी ग़लतियां हुई हैं. एक तो मामला मुफ्त में कोयला खदानें देना और दूसरी यह कि जिन कंपनियों को कोयला खदानें दी गईं, उन्होंने सारे क़ानूनों को ता़ख पर रख दिया.

इस घोटाले में कई नियम तोड़े गए. ऐसे नियमों और शर्तों की अनदेखी की गई, जिन्हें किसी भी सूरत में अनदेखा नहीं किया जा सकता. ऐसी एक शर्त यह है कि लाइसेंस मिलने पर एक तय अवधि के बाद खनन शुरू हो जाना चाहिए. जिन खदानों में कोयले का खनन सतह के नीचे होता है, उनमें आवंटन के 36 माह बाद खनन प्रक्रिया शुरू हो जानी चाहिए. यदि खदान ओपन कास्ट क़िस्म की है तो यह अवधि 48 माह की होती है. अगर खदान जंगल में है तो यह अवधि छह महीने बढ़ा दी जाती है. नियम के मुताबिक़, इस अवधि में काम शुरू नहीं होता है तो खदान मालिक का लाइसेंस रद्द कर दिया जाता है. इस प्रावधान को इसलिए रखा गया है, ताकि खदान और कोयले का उत्खनन बिचौलियों के हाथ न लगे, जो सीधे-सीधे तो कोयले का काम नहीं करते, बल्कि खदान ख़रीद कर ऐसे व्यापारियों या उद्योगपतियों को बेच देते हैं, जिन्हें कोयले की ज़रूरत है. इस गोरखधंधे में बिचौलिए मुंह मांगे दामों पर खदानें बेच सकते हैं. सरकार ने ऐसी किसी खदान का लाइसेंस रद्द नहीं किया, जो तय अवधि के भीतर उत्पादन शुरू नहीं कर पाईं. क्या खदान मालिकों पर इस देश का क़ानून लागू नहीं होता है या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि ये खदानें बिचौलियों को आवंटित की गई थीं, ताकि वे उन्हें आगे चलकर उद्योगपतियों को आसमान छूती क़ीमतों पर बेच सकें? यदि सरकार और बिचौलियों के बीच साठगांठ नहीं थी तो ऐसा कैसे हो गया?

2003 तक 40 ब्लॉक बांटे गए थे, जिनमें अब तक स़िर्फ 24 ने उत्पादन शुरू किया है. तो बाक़ी 16 कंपनियों के लाइसेंस ख़ारिज क्यों नहीं किए गए? 2004 में 4 ब्लॉक बांटे गए थे, जिनमें आज तक उत्पादन शुरू नहीं हो पाया. 2005 में 22 ब्लॉक आवंटित किए गए, जिनमें आज तक केवल 2 ब्लॉकों में ही उत्पादन शुरू हो पाया है.

इसी तरह 2006 में 52, 2007 में 51, 2008 में 22, 2009 में 16 और 2010 में एक ब्लॉक का आवंटन हुआ, लेकिन 18 जनवरी, 2011 तक की रिपोर्ट के अनुसार, कोई भी ब्लॉक उत्पादन शुरू होने की अवस्था में नहीं है. पहले तो बिचौलियों को ब्लॉक मुफ्त दिए गए, जिसके लिए माइंस और मिनरल एक्ट में संशोधन को लोकसभा में चार साल तक रोके  रखा गया. फिर जब उन बिचौलियों की खदानों में उत्पादन शुरू नहीं हुआ तो भी उनके लाइसेंस रद्द नहीं किए गए. सरकार, बिचौलियों एवं फर्ज़ी कंपनियों के बीच साठगांठ होने की आशंका बढ़ जाती है. वरना आज 208 ब्लॉकों में से स़िर्फ 26 में उत्पादन हो रहा हो, ऐसा न होता.

सरकार कहती है कि देश को ऊर्जा क्षेत्र में स्वावलंबी बनाना आवश्यक है. देश में ऊर्जा की कमी है, इसलिए अधिक से अधिक कोयले का उत्पादन होना चाहिए. इसी उद्देश्य से कोयले का उत्पादन निजी क्षेत्र के लिए खोलना चाहिए, लेकिन सरकार ने एक तऱफ विकास का नारा देकर जनता को गुमराह किया और दूसरी तऱफ देश की सबसे क़ीमती धरोहर बिचौलियों और उद्योगपतियों के नाम कर दी.

महाराष्ट्र के माइनिंग डेवलपमेंट कॉरपोरेशन ने भी इस प्रक्रिया के चलते कोल इंडिया से कुछ ब्लॉक मुफ्त ले लिए. ये ब्लॉक थे अगरझरी, वरोरा, मार्की, जामनी, अद्कुली और गारे पेलम आदि. बाद में कॉरपोरेशन ने उक्त ब्लॉक निजी खिलाड़ियों को बेच दिए, जिससे उसे 750 करोड़ रुपये का  फायदा हुआ. यह भी एक तरीक़ा था, जिससे सरकार इन ब्लॉकों को बेच सकती थी, लेकिन ब्लॉकों को तो मुफ्त ही बांट डाला गया.

ऐसा भी नहीं है कि बिचौलियों के होने का स़िर्फ क़यास लगाया जा रहा है, बल्कि महाराष्ट्र की एक कंपनी, जिसका कोयले से दूर-दूर तक लेना-देना नहीं था, ने कोयले के एक आवंटित ब्लॉक को 500 करोड़ रुपये में बेचकर अंधा मुनाफ़ा कमाया. मतलब यह कि सरकार ने कोयले और खदानों को दलाल पथ बना दिया, जहां पर खदानें शेयर बन गईं, जिनकी ख़रीद-फरोख्त चलती रही और जनता की धरोहर का चीरहरण होता रहा.

अगर इस साल के बजट को भी देखा जाए तो सामाजिक क्षेत्र को एक लाख साठ हज़ार करोड़ रुपये आवंटित हुए. मूल ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) को दो लाख चौदह हज़ार करोड़, रक्षा मंत्रालय को एक लाख चौसठ हज़ार करोड़ रुपये आवंटित किए गए. भारत का वित्तीय घाटा लगभग चार लाख बारह हज़ार करोड़ रुपये है. टैक्स से होने वाली आमद नौ लाख बत्तीस हज़ार करोड़ रुपये है. मतलब यह कि आम जनता की तीन साल की कमाई पर लगा टैक्स अकेले इस घोटाले ने निगल लिया. मतलब यह कि इतने पैसों में हमारे देश की रक्षा व्यवस्था को आगामी 25 सालों तक के लिए सुसज्जित किया जा सकता था. मतलब यह कि देश के मूल ढांचे को एक साल में ही चाक-चौबंद किया जा सकता था. सबसे बड़ी बात यह कि वैश्विक मंदी से उबरते समय हमारे देश का सारा क़र्ज़ चुकाया जा सकता था. विदेशी बैंकों में रखा काला धन आजकल देश का सिरदर्द बना हुआ है. बाहर देशों से अपना धन लाने से पहले इस कोयला घोटाले का धन वापस जनता के पास कैसे आएगा?

अब सवाल यह है कि इन कंपनियों में ऐसी क्या खास बात है कि ये क़ानून भी तोड़ती हैं, फिर भी इनके खिला़फ कार्रवाई नहीं होती? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जब इन कंपनियों को कोयला निकालना ही नहीं था तो इन्होंने इन खदानों पर क़ब्ज़ा क्यों जमा लिया? पिछले एक महीने से सरकार कह रही है कि देश में कोयले की कमी है. हक़ीक़त यह है कि इस घोटाले में जितना कोयला निजी कंपनियों को दिया गया है, वह अगले 50 सालों तक के लिए पर्याप्त है. इसमें कोई शक की गुंजाइश नहीं है कि यह घोटाला एक साज़िश के तहत किया गया है.

इस घोटाले को अधिकारियों, नेताओं एवं पूंजीपतियों की साठगांठ से अंजाम दिया गया है. देश की खनिज संपदा, जिस पर 120 करोड़ भारतीयों का समान अधिकार है, को इस सरकार ने मुफ्त में अनैतिक कारणों से प्रेरित होकर बांट दिया. अगर इसे सार्वजनिक नीलामी प्रक्रिया अपना कर बांटा जाता तो भारत को इस घोटाले से हुए 26 लाख करोड़ रुपये के राजस्व घाटे से बचाया जा सकता था और यह पैसा देशवासियों के हित में ख़र्च किया जा सकता था.

चौथी दुनिया ब्यूरो April 5th, 2012
http://www.chauthiduniya.com/2012/04/fourth-global-report-proved-true-the-truth-about-coal-scam.html

कैश फॉर वोट घोटाला : असली गुनहगार कोसों दूर

'नोट फॉर वोट सन् 2008 में संसद की वह एतिहासिक घटना जिसने पूरे विश्व में भारत को शर्मशार कर दिया था। हालांकि इस मामले में मुख्य आरोपी बने सपा से निष्कासित सांसद अमर सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन यह कहना भी गलत नहीं होगा कि अमर सिंह के साथ अन्याय हो रहा है! अमर तो छोटी मछली की तरह मोहरा बने, जबकि बड़े गुनाहगार अभी भी कोसों दूर हैं। ऐसे में अमर के साथ न्याय तभी होगा जब सभी साथ-साथ जेल की सैर करें। जबकि सच तो यह है कि इन बड़े गुनाहगारों खिलाफ कोई चार्जशीज दाखिल करना तो दूर उनका नाम तक नहीं लिया जा रहा है। इसे जांच एंसेजी की लापरवाही कहें या फिर सत्ताधारी पार्टी का दबाव लेकिन जो भी हो अकेले अमर सिंह इस पूरे कांड के कर्ता-धर्ता तो नहीं हो सकते।

'कैश फॉर वोट कांड में अमर सिंह की गिरफ्तारी ने देश की सियासत में भूचाल ला दिया है। विपक्ष ने जहां अमर सिंह को जेल भेजने के कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है, वहीं इस कांड से फायदा उठाने वाली मनमोहन सरकार को क्लीन चिट दिए जाने पर भी सवाल उठाए हैं।  कानून की आंखों में लगातार धूल झोक रहे अमर सिंह आखिरकार नंगे हो गए। खुद अपने ही हाथों अपने लिए कब्र खोदी। उनकी गंदी राजनीति का नतीजा उनके राजनैतिक पतन का कारण बना। आपको बताते चलें कि यह वही अमर सिंह हैं जिन्होंने इस मामले में खुद को पाक-साफ बताया था। लगातार जांच के दौरान अपने बयानों में फंसाने की बात करते रहते थे।

क्यों खरीदे जा रहे थे सांसद
अमरीका से परमाणु संधि के अपने फैसले पर कायम रहने के प्रधानमंत्री के बयान के बाद वाम दलों के 61 सदस्यों ने सरकार से समर्थन वापस लेते हुए इसे अल्पमत में ला दिया था। इसके बाद सरकार को विश्वास मत हासिल करना पड़ा जिसमें बाहर से बड़ी संख्या में सांसदों का समर्थन चाहिए था और तभी शुरू हुआ सांसदों की खरीद-फरोख्त का खेल।

अमर सिंह का ड्रामा

अदालती कार्रवाई से बचने के लिए अमर सिंह ने खूब चक्कर चलाया। अमर के वकील ने अदालत में एक याचिका दाखिल उनके अस्वस्थ बताया और अदालत में हाजिर न होने की छूट मांगी। वकील ने दलील देते हुए कहा कि अमर सिंह स्वस्थ नहीं हैं और वह बिस्तर पर हैं। डॉक्टर ने उन्हें घूमने-फिरने से मना किया है।  अदालती कार्रवाई के दौरान ही अमर सिंह के गुर्दे में समस्या पैदा हो गई, उन्हें रक्तचाप की भी शिकायत आने लगी।

ना रहा जवाब, तो पहुंचे अदालत
विशेष न्यायाधीश संगीता ढींगरा सहगल ने वकील से अमर के स्वास्थ्य की चिकित्सा रिपोर्ट पेश करने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि यह रिपोर्ट में उस तारीख का उल्लेख होना चाहिए कि कब उनके गुर्दे का प्रत्यारोपण हुआ था, और उसके बाद वह कितनी बार चिकित्सक के पास गए। इससे घबराए आखिरकार अमर अदालत पहुंचे। जिसके बाद कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए अमर सिंह 14 दिन की न्यायिक हिरासत यानी 19 सितंबर तक के लिए तिहाड़ जेल भेज दिया गया।

अमर सहित छह आरोपी

मालूम हो कि दिल्ली पुलिस ने मामले में सांसद अमर सिंह, फग्गन सिंह कुलस्ते और महाबीर सिंह भगोरा और सुधींद्र कुलकर्णीं सहित छह लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किए हैं। विशेष अदालत आरोपपत्र पर संज्ञान लेकर चारों आरोपियों को 6 सितंबर को कोर्ट में पेशी के लिए सम्मन जारी किया था। जबकि दो अन्य आरोपी संजीव सक्सेना व सुहेल हिंदुस्तानी पहले से ही हिरासत में हैं। इस मामले में दिल्ली पुलिस की ओर से आरोपपत्र दाखिल किए जाने के बाद अमर व तीन अन्य को मंगलवार को अदालत के सामने उपस्थित होना था। सहगल ने 25 अगस्त को अमर, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पूर्व सांसदों फग्गन सिंह कुलस्ते, अशोक अर्गल और महावीर भगोरा को समन जारी किया था। कुलस्ते और भगोरा को भी 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया है।

एक करोड़ का षडय़ंत्र

22 जुलाई, 2008 को तीन भाजपा सांसदों ने लोकसभा में विश्वास मत के दौरान नोटों की गड्डियां लहराई थीं। इन सांसदों का आरोप था कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार के पक्ष में वोट देने के लिए उन्हें यह पैसा दिया गया है। आरोपपत्र में कहा गया है कि जांच के दौरान इस बात के पर्याप्त सबूत मिले हैं कि 22 जुलाई, 2008 की सुबह अमर सिंह ने अपने सचिव संजीव सक्सेना के साथ अवैध रूप से एक करोड़ रुपये देने का आपराधिक षडय़ंत्र रचा था।

फायदा उठाने वाले को क्लीनचिट
अमर सिंह को जेल हो जाने के बाद जहां कई विपक्षी नेता खुश हैं वहीं इस कांड से फायदा उठाने वाली मनमोहन सरकार को क्लीन चिट दिए जाने पर भी उन्होंने सवालिया निशान लगा दिया है। आपको याद दिला दें कि दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री के खिलाफ याचिका दाखिल करने वाले संतोष कुमार सुमन पर एक लाख का जुर्माना ठोंका था। कोर्ट ने इस याचिका को बेवजह करार देते हुए नसीहत दी थी कि किसी के खिलाफ याचिका दाखिल करने से पहले उसे जांच-परख ली जाए। साथ ही कोर्ट ने इसे सस्ती लोकप्रियता का आधार भी बताया था।

याचिका में दलील
याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि चूंकि सांसदों को पैसे कथित रूप से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार को बचाने के लिए दिए गए थे और पैसे की पेशकश में प्रधानमंत्री की मिलीभगत जाहिर होती है इसलिए उनके खिलाफ मामला दायर होना चाहिए।

पैसों का रहस्य बरकरार
जनता बेहाल है लेकिन देश के नेता मालामाल हैं। गरीबों की झोलियां खाली हैं, पर संसद में नोटों की गड्डियां हवा में तैरती हैं। आज भी इस बात का पुख्ता खुलासा नहीं हो सका कि इतना पैसा सांसदों के पास आया कहां से। हालांकि इस मामले में पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से धन के स्रोत का पता लगाने को कहा था। समय गुजरता गया, दिल्ली पुलिस के दावे होते रहे, जांच भी जारी है लेकिन दिल्ली पुलिस के हाथ अभी तक कुछ नहीं आया।

जांच पर उठे थे सवाल
बता दें कि इस मामले में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह ने जांच के प्रति अविश्वास जाहिर कर याचिका भी दायर की थी। याचिकाकर्ता लिंगदोह के वकील ने मामले के निपटारे का विरोध किया। उन्होंने जांच पर सवाल उठाते हुए कहा कि पुलिस ने अभी तक यह पता नहीं लगाया कि इस कांड के वास्तविक लाभार्थी कौन थे। उन्होंने याचिका लंबित रखने की मांग की लेकिन पीठ ने इससे इंकार कर दिया। अदालत ने कहा कि आरोपपत्र दाखिल हो चुका है, आपकी याचिका का मुख्य उद्देश्य पूरा हो गया है अब आगे की कार्यवाही संबंधित सुनवाई अदालत में होगी। इतना कह कर कोर्ट ने मामले का निपटारा कर दिया।

पहली गिरफ्तारी (संजीव सक्सेना)

इस मामले में सबसे पहले संजीव सक्सेना को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया था। बता दें संजीव सक्सेना की समाजवादी पार्टी के पूर्व नेता अमर सिंह का सबसे नजदीकी कलीग था। काफी समय बीतने बात जब कोई गिरफ्तारी न हो सकी तो सुप्रीम कोर्ट ने 15 जुलाई को दिल्ली पुलिस को फटकार लगाई। जिसके बाद हरकत में आई दिल्ली पुलिस ने संजीव सक्सेना को गिरफ्तार किया था।

दूसरी गिरफ्तारी (सुहैल हिंदुस्तानी)
दूसरी गिरफ्तारी के रूप में दिल्ली पुलिस ने सुहैल हिंदुस्तारी को गिरफ्तार किया। बिचौलिए की भूमिका निभाने वाला सुहैल हिन्दुस्तानी ने खुद को भारतीय जनता युवा मोर्चा का पूर्व सदस्य बताया। गिरफ्तारी के बाद सुहैल हिदुस्तानी ने पूछताछ में क्राइम ब्रांच के सामने ढेरों खुलासे किए थे। सुहैल ने आरोप लगाया था इस मामले में अमर सिंह, रेवती रमन सिंह और अहमद पटेल ने अहम भूमिका निभाई थी। सुहैल के संपर्क में कांगे्रसी नेता = सुहैल का यह भी कहना था कि इस कांड में 12 से 15 कांग्रेसी नेता थे जो उस दौरान संपर्क में थे। उनमें से कुछ प्रधानमंत्री के करीबी भी थे।

कुलस्ते, भगोरा भी तिहाड़ में

''भाजपा के दो पूर्व सांसदों महावीर भगोरा व फग्गन सिंह कुलस्ते को मंगलवार को गिरफ्तार कर 19 सितंबर तक न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया। इन सभी पर 2008 के वोट के लिए नोट मामले में कथित रूप से लिप्त होने का आरोप है। इन्हें तिहाड़ जेल नंबर 3 में पहुंचा दिया गया जहां झारखंड के नेता मधु कौडा बंद हैं। इनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आपराधिक साजिश) की धारा-120 (बी) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा-12 के तहत कार्रवाई की गई है।

जांच की आंच - निष्पक्ष नहीं दिल्ली पुलिस
जांच एजेंसियां और पुलिस  बिना अदालतों  की फटकार के बिना अपना काम सही ढंग से नहीं होता। यह इसी बात से साबित हो जाता है कि तीन साल बीतने के बाद भी दिल्ली पुलिस निठल्ली बन तमाशा देखती रही। कारण जो भी रहा हो लेकिन साफ जाहिर होता है कि दिल्ली पुलिस निष्पक्षता से कोसों दूर है। शायद सांप की तरह कुंडली मारे बैठी दिल्ली पुलिस पर सत्ताधारी  पार्टी या प्रभावशाली और पैसों वालों का प्रभाव चलता है। रही बात गुनाहगारों पर हाथ डालने की तो इस मामले में ऐसे लोग भी फंसते नजर आ रहे थे जो खुद चिल्ला-चिल्लाकर मामले को तूल देते हुए दिखे। यहां यह सवाल उठता है कि जो काम फटकार खाने के बाद,  मात्र 24 से 72 घंटों मे कर दिया गया वह पिछले 3 सालों में क्यों नहीं किया गया था,  इस अपराधपूर्ण लापरवाही के लिए कौन-कौन जिम्मेदार है। क्या दिल्ली पुलिस ने सबूतों को छिपाकर रखा था या फिर सिर्फ कोर्ट के डर से उसने गिरफ्तारियां कीं थी।

लापरवाही या साजिशन कार्रवाई
यह तो सभी जानते हैं कि उस वक्त सरकार खतरे में थी और भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी के करीबी माने जाने वाले सुधीन्द्र  कुलकर्णी तक जांच की आंच पहुंच सकती थी,  इसी के साथ-साथ कांग्रेस अध्यक्ष के राजनैतिक सचिव  अहमद पटेल भी  लपेटे में आ सकते थे, इसलिए दिल्ली पुलिस दबाव में थी और उसने मामले  को ठंडे बस्ते मे डाले रखा था।  अब इसे दिल्ली पुलिस की लापरवाही कहें या साजिसन कार्रवाई, पर एक बात साफ हो चुकी है कि दिल्ली पुलिस पर सत्ताधारी पार्टी का पूरा दबाव है।

भ्रष्ट दलदल में कांग्रेस
कांग्रेस भ्रष्टाचारी दलदल के कीचड़ में पूरी तरह सनी हुई है। वरना कांग्रेस ने जांच में दिलचस्पी क्यों नहीं दिखाई? कांग्रेस कितनी भ्रष्ट और तानाशाह है इसी बात से दिख जाता है जब भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन पर बैठे बाबा रामदेव और उनके समर्थकों पर हमला करवा दिया। और तो और कांग्रेसी नेता सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे को भ्रष्ट कहने से भी बाज नहीं आए।

ऐसी चली थी पुलिस कार्रवाई
संसद में सरकार बचाने के लिए सांसदों को करोड़ों में खरीदने के सनसनीखेज कैश फॉर वोट प्रकरण में आश्चर्यजनक रूप से किसी नेता को शामिल नहीं पाया गया। जबकि इसमें अमर सिंह और अहमद पटेल के नाम आ रहे थे। दिल्ली पुलिस ने दावा किया था कि उसके पास देश के इस सबसे बड़े राजनीतिक घोटाले में जिम्मेदार ठहराने के लिए किसी भी नेता के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला है। साथ में ही जांच में पुलिस को कोई सबूत नहीं मिला है कि सुहैल हिंदुस्तानी का किसी राजनेता ने संपर्क हुआ था। गत् 5 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने 'बेमन से जांच पर दिल्ली पुलिस को कस कर फटकार लगाई थी और उससे जांच को तार्किक परिणति तक ले जाने एवं तीन हफ्तों में अंतिम रिपोर्ट दाखिल करने को कहा था। न्यायमूर्ति आफताब आलम और न्यायमूर्ति आरएम लोढा की खंडपीठ ने इस पर अफसोस जताया था कि 'सबसे घटिया किस्म के एक बिचौलिए को संसदीय कार्यवाही को पटरी से उतारने की इजाजत दी गई। खंडपीठ ने 2008 के इस घोटाले में किसी भी राजनीतिक नेता का हाथ नहीं होने का दावा करने वाली दिल्ली पुलिस की प्राथमिक रिपोर्ट के अध्ययन के बाद कहा था, 'यह आपका (दिल्ली पुलिस) बेमन का प्रयास है।

चालीस दिन की मोहलत
अदालत की फटकार के बाद नींद से जागी दिल्ली पुलिस ने अदालत से 40 दिन की मोहलत मांगी। इस पर अदालत ने आग्रह ठुकराते हुए कहा था कि वह तीन हफ्तों के अंदर अपनी अंतिम रिपोर्ट दाखिल कर दे।

आखिरकार लंबे अर्से के बाद कार्रवाई हुई और पुलिस ने सुहैल हिंदुस्तानी और संजीव सक्सेना को गिरफ्तार किया। साथ ही सांसद अमर सिंह, अशोक अर्गल और रेवती रमण सिंह से पूछताछ कर अपनी रिपोर्ट एक मुहरबंद लिफाफे में दाखिल की। यही नहीं अमर सिंह और अशोक अर्गल समेत 5 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई है।

अमर से पूछे गए थे 12 सवाल
गिरफ्तारी से पहले जांच के दौरान दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच की टीम ने कैश फॉर वोट मामले में सांसद अमर सिंह से 12 सवाल किए थे। लेकिन बड़ी ही चालाकी से अमर से उनका जवाब दिया था।
1. अमर सिंह से फोन नंबर के संबंध में की गई पूछताछ?
2. किस बैंक से पैसे निकाले गए?
3. इन खातों में कहां से ये पैसे आए?
4. सक्सेना कौन है?
5. क्या जिस कार को पैसे ले जाने के लिए इस्तेमाल किया गया वो आपका है?
6. ड्राइवर संजय और उसका मोबाइल नंबर क्या है?
7. गुरुजी और मिस्टर गुप्ता का क्या रोल है?
8. उनके इस कांड में संलिप्तता कि आपको कैसे जानकारी है?
9. इन दोनों को आप कैसे जानते हैं?
10. कैश फॉर वोट कांड वाले दिन आप कहां थे?
11. क्या आप उन बीजेपी सांसदों से मिले हैं जिन्हें पैसे का ऑफर दिया गया था?
12. क्या आपने सक्सेना का उनसे परिचय कराया था?

मुलायम का राजनीतिक दांवपेच
जब 'नोट के बदले वोट मामले में अमर सिंह फंसे हुए थे उस वक्त शायद मुलायम सिंह को  अपनी दोस्ती याद आई थी। तभी एक झटके में उन्होंने कह डाला था अमर सिंह बेकसूर हैं। दिल्ली पुलिस द्वारा अमर से इस मामले में पूछताछ करना अन्याय है और वह अमर सिंह की इस मामले में मदद करेंगे ताकि वे इस इस संकट से बाहर आ सकें। हालांकि अब उनकी गिरफ्तारी के बाद मुलायम का दिखना तो दूर, उनका कोई बयान भी नहीं आया। क्या अब भी मुलायम, अमर को निर्दोष मानते हैं।

आपकों बता दें जिस समय अमर सिंह पर पुलिस का शिकंजा कस रहा था उस वक्त मुलायम उनके हिमायती बनकर खड़े हुए थे। यह उनकी दरियादिली थी या राजनीतिक दांवपेंच। फिलहाल जानकारों का कहना था कि सपा सुप्रीमो चाहते थे कि अमर सिंह फिर उनकी पार्टी में आ जाएं। लिहाजा उन्होंने अमर का पक्ष लिया था।

सपा सुप्रीमो यह कहते नहीं थक रहे थे कि अमर सिंह के साथ जो कुछ भी किया जा रहा है वह अन्याय है और यह अमर सिंह और रेवती रमण को परेशान करने की साजिश है।

अमर के एहसान याद करे कांग्रेस
कांग्रेस शायद अमर सिंह के अहसानों को भूल चुकी थी, तभी तो मुलायम सिंह ने अमर के उन एहसानों की याद दिलाई थी जब उन्होंने वर्ष 2008 में विश्वास मत के दौरान कांग्रेस की मदद की थी।

सच जानता हूं मैं
मुलायम सिंह ने यह भी कहा था कि मुझे सच पता है ओर वह यह है कि अमर सिंह भाजपा सांसदों को घूस देने में शामिल नहीं हैं। हम लोगों ने कांग्रेस के पक्ष में वोट देकर कांग्रेस की सिर्फ मदद की थी। क्या हम लोग सरकार में शामिल हुए? क्या रेवती सिंह और अमर सिंह मंत्री बन गए? अगर पैसों का लेनदेन होता तो मुझे इस बारे में जरुर पता होता।

इनकी नजर में

बीजेपी प्रवक्ता राजीव प्रताव रूडी:
अमर सिंह की गिरफ्तारी हो गई लेकिन उन लोगों का क्या जिन्हें इससे फायदा हुआ। इससे फायदा हुआ यूपीए सरकार को, मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की सरकार को। उनकी भूमिका की भी जांच की जानी चाहिए। 'अमर सिंह को जिस जगह होना चाहिए वो वहीं पहुंच गए हैं

सपा प्रवक्ता मोहन सिंह:

असली दोषी जेल से बाहर हैं। ये मामले की लीपापोती हो रही है। पुलिस उन लोगों का पता लगाए जिन्होंने अमर को इस काम के लिए तैयार किया। तीन करोड़ रुपये दिए गए थे लेकिन एक करोड़ ही सामने आए। बाकी के दो करोड़ रुपये कहां गए। जिसने जैसा किया है वो वैसा फल पाएगा। लेकिन ये कौन सा तरीका है कि सरकार चलाने वाले सारे लोग ईमानदार हैं और सरकार के बाहर के सभी लोग बेईमान।

सीपीआई नेता गुरुदास दासगुप्ता:

अमर सिंह अपनी सही जगह पहुंच गए हैं। कैश फोर वोट कांड का फायदा सरकार ने उठाया। प्रधानमंत्री को इस पर सफाई देनी चाहिए। अमर सिंह को आगे करने वाला कौन था। उनको भी जेल भेजना चाहिए।

आरोपी सांसद और बीजेपी नेता अशोक अर्गल:

दिल्ली पुलिस तीन साल से कहां थी? सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद ही ये कार्यवाही हुई। हम कोर्ट और कानून का सम्मान करते हैं। लेकिन कांग्रेस को क्यों छोड़ा जा रहा है? क्या सांसदों की खरीद-फरोख्त नहीं होती? कोई मुफ्त में दल बदलता है क्या? क्या जेएमएम के सांसद नहीं खरीदे गए? जिसने मामले का खुलासा किया उन्हें जेल भेजा जा रहा है और जिन्होंने फायदा उठाया उन्हें क्लीन चिट मिल गई।

सीपीएम नेता मोहम्मद सलीम:

कैश फोर वोट कांड में अमर सिंह ने मुख्य भूमिका निभाई थी। उम्मीद है कि कानून के हाथ आखिरी दोषी तक पहुंचेंगे। उम्मीद है कि अमर सिंह सच्चाई बयान करेंगे। कोर्ट को इस केस की पूरी जांच पर नजर रखनी होगी वर्ना जांच में कुछ भी सामने नहीं आ पाएगा।

कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी:

कैश फोर वोट कांड की जांच कोर्ट की निगरानी में हो रही है। पुलिस जांच में जो तथ्य सामने आए उसी के आधार पर चार्जशीट दायर की गई है। कांग्रेस के पास कोर्ट की निगरानी में हो रही जांच पर टिप्पणी करने का कोई कारण नहीं है।

संसदीय कार्यमंत्री पवन बंसल:

पीएम हर मसले पर जवाब नहीं देंगे। कोई भी रिकॉर्ड उठाकर देख सकता है कि यूपीए को संसद में मतविभाजन के दौरान वोटों की जरूरत नहीं थी। उसके पास पहले से ही बहुमत था।

साभार
अरुण पटेल विद्रोही, बुधवार, 7 सितम्बर 2011
http://hadtal.blogspot.in/2011/09/blog-post_07.html

वसई में बिक्रीकर घोटाला - फर्जी कारोबार से सरकार को 2 करोड़ का चूना

वसई।। ठाणे के सहायक बिक्रीकर आयुक्त अतुल विश्वनाथ खांडोलकर ने एवरशाइन सिटी, वसई में रहने वाले हरीश अनंत थोराट के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार को 2 करोड़ से अधिक का राजस्व घाटा पहुंचाने के आरोप में मामला दर्ज कराया है।

सूत्र के अनुसार हरीश जमीन की खरीद-बिक्री का कारोबार करता है और रिद्धि इंटरप्राइजेज का प्रोप्राइटर है। इसने झूठे कागजात, बनावटी सील-मोहर व फर्जी विवरण पत्र बना कर सरकार को 2,05,90,565 रुपये का नुकसान पहुंचाया है। सहायक बिक्रीकर आयुक्त ने नालासोपारा पुलिस में हरीश के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है और आर्थिक व्यवहार में हेराफेरी की जांच के लिए यह मामला भाईंदर आर्थिक गुनाह शाखा को सौंपा गया है।

साभार
नवभारत टाइम्स | Aug 6, 2012, 06.30AM IST
http://navbharattimes.indiatimes.com/Fictitious-business-delivered-by-the-government-deficit-of-2-million/articleshow/15366439.cms

अमरोहा भूखंड घोटाला - विधायक के बेटे को 25 रु महीने पर करोड़ों की जमीन


अमरोहा। यूपी के शहर अमरोहा में एक ऐसा घोटाला सामने आया है जिसके बारे में जानकर आप दंग रह जाएंगे। यूं तो सत्ताधारी बीएसपी और मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी में छत्तीस का आंकडा़ है, लेकिन इस शहर में नजारा कुछ और है। यहां समाजवादी पार्टी के एक दबंग विधायक के बेटे को करोड़ों की सरकारी जमीन कौड़ियों के भाव दे दी गई। इस जमीन पर शहर का कूड़ा डाला जाता था। जिस नगरपालिका परिषद की ओर से ये जमीन 25 रुपये महीने की लीज पर दी गई, उसके अध्यक्ष एक बीएसपी नेता हैं। जिला प्रशासन ने भी मामले पर चुप्पी साध ली है।

नगरपालिका की इस बीस बीघा जमीन का खसरा नंबर 5826 है। सरकार के राजस्व रिकार्ड में साफ है कि इस जमीन पर शहर का कूड़ा और खाद डाली जाएगी और ये सरकारी सार्वजनिक सम्पत्ति है। यूं तो जमीन का लैंड यूज बदले बगैर ये किसी को दी नहीं जा सकती, लेकिन बीएसपी नेता और नगर पालिका अध्यक्ष हाजी इकरार ना जाने क्यों समाजवादी पार्टी के दबंग विधायक महबूब अली के बेटे शाहनवाज पर मेहरबान हैं जिसके नाम पर ये जमीन आवंटित कर दी गई। सिर्फ 25 रुपये महीने पर।

लैंड यूज बदलने का अधिकार सिर्फ सरकार को होता है। वो भी तब जब शहर के विकास या अन्य आवश्यक आपूर्ति के लिए किसी जमीन के इस्तेमाल की जरूरत पड़े। जिले से प्रस्ताव पारित होकर सरकार को भेजा जाता है। वो पास होता है तो फिर जमीन हस्तांतरित की जाती है। लेकिन अमरोहा में ये सब नहीं किया गया। नगर पालिका परिषद अमरोहा ने 29 मई 2010 को ये जमीन शाहनवाज के नाम हस्तांतरित कर दी।

इस खेल का पता तब चला जब इस जमीन पर पेट्रोल पंप का निर्माण कार्य शुरू हुआ। पेट्रोल पंप करीब 2 हजार गज पर बन रहा है जिसके लिए विधायक के बेटे को भारत पेट्रोलियम पांच सौ रुपये महीना किराया देगा। किराये का करार तीस साल के लिए हुआ है। नगर पालिका कर्मचारियों ने इसे रजिस्ट्री कार्यालय में सत्यापति भी कर दिया है। इस मामले में जब नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी बी डी भट्ट से दफ्तर में सम्पर्क करने की कोशिश की गई तो उन्होंने मिलने से ही मना कर दिया। वहीं, जिलाधिकारी कार्यालय की भूमिका भी जांच के घेरे में है। डीएम अभय कुमार कह रहे हैं कि वे मामले की तस्दीक करेंगे।

उधर, नगर पालिका चेयरमैन हाजी इकरार ने भी चुप्पी साध ली है। जिस दिन से ये मामला चर्चा में आया है, उस दिन से वे दफ्तर ही नहीं आए। फोन पर भी बात करने को तैयार नहीं। दूसरी ओर कांग्रेस इसे मुद्दा बनाने की तैयारी कर रही है।

इस मामले के खुलासे से विधायक महबूब अली खासे खफा हैं। वे मीडिया का नाम सुनते ही भड़क जाते हैं। उन पर 14 मुकदमे दर्ज हैं और वो हमेशा से विवादों में रहे हैं। सीएनएन आईबीएन के एक स्टिंग ऑपरेशन के बाद मुलायम सरकार में उनकी मंत्री पद से छुट्टी हो गई थी। लेकिन बीएसपी सरकार में भी उनका रुतबा बना हुआ है। ये उनके दबदबे का सबूत ही है कि नियमों को ताक पर रखकर करोड़ों की जमीन मात्र 25 रुपये महीने किराये पर उन्हें दे दी गई।

साभार
आईबीएन-7 / Posted on Dec 02, 2011
http://khabar.ibnlive.in.com/news/63453/16/4?from=RHS

Sunday, August 5, 2012

Passport Scam in Mumbai & Delhi in 2005

New Delhi : In yet another television expose, a news channel on Thursday said that two MPs of the Bahujan Samaj Party (BSP) from Uttar Pradesh had allegedly procured new passports by claiming that they have lost the originals.

The CNN- IBN channel alleged that Ramakant Yadav, MP from Azamgarh, and Bal Chandra Yadav, who represents Khalilabad, had filed false statements at a police station here claiming that they have lost their passports.

Their passports were awaiting visa clearance at the Canadian High Commission since October 2003, it said. 
Source : PTI / The Hindu

As Explained in the Forum:This is a well organized conspiracy by Indian Immigration, Police, Customs and Air India staff with networking at all the Indian International Airports. Be watchful whenever you give your passport to Immigration/ Customs/ Air India staff. The pass port can be easily tampered and can create trouble to you. They have found easy way of making money from NRIs.

This is the way it works:
At the time of the passenger's departure, if the passenger is not looking at the officer while he is stamping the exit, the officer very cleverly tears away one of the page from the passport. When the passenger leaves the immigration counter, the case is reported on his computer terminal with full details.


Now all over India they have got full details of the passenger with Red Flag flashing on the Passport number entered by the departure immigration officer. They have made their money by doing above. On arrival next time, he is interrogated. Subject to the passenger's period of stay abroad, his income and standing, etc., the price to get rid of the problem is settled by the Police and Immigration people. If someone argues, his future is spoiled because there are always some innocent fellows who think the honesty is the basis of getting justice in India. Please advise every passenger to be careful at the airport. Whenever they hand over the passport to the counters of Air India, or immigration or the customs, they must be vigilant, should not remove eyes from the passport even if the officer in front tries to divert their attention.

Also, please pass this information to all friends, media men and important politicians. Every month 20-30 cases are happening all over India to rob the NRIs the minute he lands. Similar case has happened with Aramco's Arifuddin. He was travelling with his family. They had six passports. They got the visa of America and decided to go via Hyderabad from Jeddah. They reached Hyderabad. Stayed about a month than left for States. When they reached States, the page of the American visa on his wife's passport was missing. At the time of departure from Hyderabad, It was there.

Whole family had to return to Hyderabad helplessly. On arrival at Bombay back, they were caught by the police and now it is over 2 months, they are running after the Police, Immigration officers and the Courts. On going in to details with him, he found out the following:

One cannot imagine, neither can believe, that the Indian Immigration dept can play such a nasty game to harass the innocent passengers.

All the passengers travelling to & fro India via Bombay and Hyderabad must be aware of this conspiracy. Every month 15 to 20 cases are taking place, at each mentioned airport, of holding the passengers in the crime of tearing away the passport pages. On interviewing some of them, none of them was aware of what had happened. They don't know who, when and why these officers tore away the page from the middle of the passport. One can imagine the sufferings of such people at the hands of the immigration, police and the court procedures in India after that. The number of cases is increasing in the last 2-3 years. People who are arriving at the immigration, they are questioned and their passports are being held and they have to go in interrogations. Obviously, the conspiracy started about 2 to 3 years ago, now the results are coming. Some of the Air India counter staff too is involved in this conspiracy.
Source: www.indiamike.com/india/scams-and-annoyances-in-india-f8/passport-scam-by-customs-police-etc-t13340/

Thursday, August 2, 2012

हसन अली: कबाड़ी बन गया खरबपति कारोबारी, देश का सबसे बड़ा टैक्‍स ‘चोर’

देश में टैक्‍स चोरी के सबसे बड़े आरोपी हसन अली खान की असल जिंदगी किसी फिल्‍मी कहानी जैसी लगती है। पुणे के इस व्यवसायी पर स्विस बैंक में करीब आठ अरब अमेरिकी डॉलर का काला धन जमा करने का आरोप है। लेकिन उसने कबाड़ का धंधा करने की बात कबूल की थी। उसका कहना है कि इस धंधे से उसे सालाना 30 लाख रुपये की कमाई होती है। लेकिन शानदार पार्टियां व घुड़दौड़ आयोजित करने के साथ महंगी कारें रखने के शौकीन हसन अली पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) का शिकंजा कसता जा रहा है।

खान की कहानी की शुरुआत हैदराबाद से होती है। वह हैदरबाद में तैनात रहे एक्‍साइज अफसर का बेटा है। खान के शुरुआती दिनों के बारे में कई बाते सामने आती रही हैं लेकिन वह चर्चा में उस वक्‍त आया जब उसके पास बड़े पैमाने पर काला धन की बात सामने आई। शुरुआती दिनों में उसने पुरानी चीजें बेचने सहित कई तरह के धंधे किए। हसन अली का दावा है कि वह हैदराबाद के निजाम के खानदान से ताल्‍लुक रखता है।

घुड़दौड़ के कारोबार की दुनिया से वह 1990 के शुरुआत में जुड़ा जब वह हैदराबाद में ही रहता था। बाद में वह इसी कारोबार से जुड़े रहते हुए मुंबई गया फिर पुणे और अन्‍य शहरों का रुख किया। कहा जाता है कि उसने अपनी पहली पत्‍नी को तलाक दे दिया है जिसके साथ वह हैदराबाद में रहता था। वह रहीमा (मौजूदा पत्‍नी) से शादी करने के बाद पुणे जाकर बस गया। देश के कोने में कहीं भी होने वाले घुड़दौड़ में अक्‍सर यह जोड़ी दिख जाती है।

मुंबई के कोर्ट में चल रहे हसन अली केस में कोर्ट ने ईडी को फटकार भी लगाई है। स्‍पेशल कोर्ट ने जांच एजेंसी से पूछा किया कि काले धन को लेकर हसन अली को कस्टडी में रखने के लिए अभी तक कोई मुकदमा क्‍यों नहीं दर्ज की है। 58 साल के हसन के मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र सरकार को मंगलवार को फटकार लगाई थी।

शीर्ष अदालत ने सरकार से पूछा कि हथियार कारोबारियों और आतंकी गतिविधियों में लिप्त लोगों से संपर्क रखने के आरोप में हसन अली के खिलाफ पोटा सहित अन्य सख्त कानूनों के तहत मुकदमा क्यों नहीं दर्ज कराया गया? विदेशों में काला धन रखने के आरोप में ईडी ने हसन को गत सोमवार देर रात गिरफ्तार किया था। आयकर विभाग ने 2007 में हसन अली के घर छापा भी मारा था। आरोप है कि हसन अली विदेशी बैंकों में काला धन जमा करने वाले भारतीयों के लिए एजेंट के तौर काम करता है। इसके बदले वह ऐसे लोगों से कमीशन वसूलता है। खान पर 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक की कर चोरी का आरोप है। सरकार ने पिछले साल राज्‍य सभा में एक सवाल के जवाब में कहा था कि हसन अली पर यह बकाया ब्‍याज सहित 70 हजार करोड़ रुपये से भी अधिक हो गया है।

ईडी ने 2007 में स्विस बैंक से हसन अली के एकाउंट का ब्‍यौरा मांगा था। लेकिन स्विस बैंक ने उससे जुड़ी जानकारियां भारतीय जांच एजेंसियों को साझा करने से मना कर दिया था। उन्‍होंने इसके लिए तकनीकी कारणों का हवाला देते हुए कहा कि भारत में टैक्‍स रिटर्न फाइल नहीं करना स्विट्जरलैंड के कानूनों के तहत अपराध नहीं है।
साभार: रामा टाईम्स, March 10th, 2011
http://ramatimes.com/?p=16873

कानूनी शिकंजे में आया डर्बी किंग हसन अली

32 हजार करोड का मालिक और डर्बी किंग हसन अली अब पुलिस की गिरफ्त में है. उसके खिलाफ फर्जी पासपोर्ट के दो मामले दर्ज थे. पुलिस को उसकी तलाश काफी अर्से थी.

हसन अली की गिरफ्तारी के लिए मुम्बई पुलिस कई दिनों से ख़ाक छानती फ़िर रही थी. इसने एक ही नाम पर फर्जी दस्तावेजो की बिना पर तीन पासपोर्ट बनवा रखे थे. अली हसन ने 1986 में पहला पासपोर्ट हैदराबाद से बनवाया, उसके बाद फर्जी नाम और पता देकर दो और पासपोर्ट मुंबई और पटना से बनवाए.

हसन का नाम तब सामने आया जब इसके पास से करोडो रुपये की नामी और बेनामी सम्पति रखने का खुलासा हुआ. इसी की जांच करते हुए एन्फोर्समेंट डाईरेकटोरेट ने पाया की हसन के पास कई फर्जी पासपोर्ट है, लेकिन इससे पहले पुलिस उसे दबोचती वो गायब हो गया .और अपनी संपत्ति की कुर्की और गिरफ्तारी पर रोक लगाने के लिए कोर्ट से स्टे आर्डर ले आया.

सोमवार को उसको अदालत से मिली इस राहत का आखरी दिन था, लिहाजा वो कोर्ट में पेश हो गया लेकिन पुलिस की अर्जी पर कोर्ट ने उसे बजाय जमानत के पुलिस हिरासत दे दी.

पुलिस ये जानना चाहती है कि इस बीच इसने किन किन देशो की यात्रा की. पुलिस ये भी जानना चाहती है कि इसने दुश्मन देश से मिलकर भारत में आंतकी कार्रवाई की फंडिग तो नही की.
साभार: आज तक ब्‍यूरो, मुंबई, 16 दिसम्बर 2008
http://aajtak.intoday.in/story.php/content/view/4845/13/0

हसन अली और उसके साथियों पर 71, 854 करोड़ टैक्स बकाया

नई दिल्ली।। टैक्स चोरी और हवाला के केस में गिरफ्तार पुणे के व्यापारी हसन अली और उसके सहयोगियों पर कितना टैक्स बकाया होगा ? अब तक आप पढ़ते आ रहे होंगे कि हसन अली से 40 हजार करोड़ रुपये टैक्स वसूले जाने हैं, लेकिन इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने अब इस आकड़े को संशोधित कर लिया है। आईटी डिपार्टमेंट के अधिकारियों ने हसन अली और उसके सहयोगियों से अब 71 हजार 845 करोड़ रुपये टैक्स की मांग की है।

आप यह जानकर चौंक सकते हैं कि यह आंकड़ा देश के हेल्थ बजट और सालान वसूले जाने वाले सर्विस टैक्स से ज्यादा है। इसके अलावा, यह राशि हमारे देश के इस साल के रक्षा बजट (1 लाख 64 हजार करोड़ रुपये) से आधे से थोड़ ही कम है। जाहिर है जब टैक्स बकाया इतना है तो कमाई कितनी होगी।

इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के आकलन के मुताबिक, हसन अली पर ही 50 हजार 329 करोड़ टैक्स बकाया है, जबकि उसकी पत्नी रहीमा को 49 करोड़ रुपये टैक्स देना होगा। हसन अली के सहयोगी काशीनाथ पर 591 करोड़ रुपये और उसकी पत्नी चंद्रिका पर 20 हजार 540 करोड़ रुपये टैक्स बनता है।

हसन अली के खिलाफ जांच तो सन् 2007 से ही चल रही है लेकिन इस मामले में तेजी पिछले सप्ताह से आई है जब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाई। रोचक बात यह है कि सरकार ने ही 2009 में ऐफ़िडेविट के जरिए कोर्ट को बताया था कि हसन अली, उसकी पत्नी रहीमा और सहयोगियों से 71,848.59 करोड़ रुपये टैक्स चुकाने को कहा है।

दूसरी तरफ, हसन अली के लिए 14 दिन की रिमांड मांग रहे प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को बुधवार को अदालत की कड़ी फटकार सुननी पड़ी। मुंबई के चीफ सेशन जज एम.एल. तहलियानी ने ईडी की वकील को पूरी तैयारी के साथ आने की हिदायत देते हुए 53 वर्षीय हसन अली को गुरुवार सुबह फिर अदालत में पेश करने के निर्देश दिए।

ईडी ने सोमवार को हसन अली को उसके पुणे स्थित घर से हिरासत में लिया। इसके बाद उसी रात मुंबई में पूछताछ के बाद गिरफ्तार कर लिया था, तब से अब तक उसे दो बार जज तहलियानी के सामने पेश किया जा चुका है। तहलियानी ने बुधवार को प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्डरिंग (अवैध धन को वैध बनाने) की धारा-44 के तहत मामले की सुनवाई शुरू की तो ईडी की वकील नीति पुंडे अपने तर्को से अदालत को सहमत नहीं कर पाईं। इस पर तहलियानी ने उन्हें लगभग फटकारते हुए कहा, ' आप कोई भी मामला बनाने में सक्षम नहीं हैं और चाहती हैं कि मैं आपको सुनूं। आप आरोपी की क्यों रिमांड चाहते हैं। आप अली के खिलाफ एक आरोप पुष्ट करें, मैं रिमांड दे दूंगा। '

जज ने यह कहते हुए मामले की सुनवाई गुरुवार तक के लिए टाल दी कि यदि आपको तैयारी करनी है तो आप समय ले सकते हैं।

ईडी की वकील नीति पुंडे ने अदालत में कहा, ' हसन अली के अंतरराष्ट्रीय हथियार व्यवसायी अदनान खशोगी से संबंध हैं और उसने स्विस बैंक में 8 अरब अमेरिकी डॉलर जमा कर रखे हैं। '
साभार: नवभारत टाईम्स, 10 Mar 2011, 1033 hrs IST,टाइम्स न्यूज नेटवर्क 
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/7668988.cms

हसन अली का खुलासा, 3 पूर्व CM का पैसा उसके खाते में

प्रवर्तन निदेशालय(ईडी) की पूछताछ में हसन अली ने खुलासा किया है कि उसके खाते में महाराष्ट्र के पूर्व तीन मुख्यमंत्रियों का पैसा जमा है। एक अखबार के मुताबिक हसन अली ने ईडी के अफसरों को बताया है कि उसके अकाउंट में जमा हजारों करोड़ रुपए में से एक बड़ा हिस्सा देश के कई बड़े नेताओं और नौकरशाहों का है। अली ने ये पैसे स्विस बैंक और दूसरे अकाउंट्स में जमा करवाए थे। इन बड़े नेताओं में महाराष्ट्र के तीन पूर्व मुख्यमंत्री भी शामिल हैं।

हालांकि ईडी ने इन मुख्यमंत्रियों और नेताओं के नाम का खुलासा नहीं किया है। हसन के इस खुलासे ने ईडी की मुश्किल आसान कर दी है जो अब तक सही जांच नहीं करने पर कोर्ट की फटकार झेल रहा था। जांच से जुड़े अफसरों का कहना है कि हसन अली, स्टॉक मार्केट के कुछ हवाला कारोबारियों की मदद से अपना ही बैंकिंग नेटवर्क चला रहा था। जिसमें देश के कई बड़े नेता और आला अफसर भी शामिल थे। अली इसके जरिए नेताओं के काले धन को सफेद करने का काम करता था।

हसन अली से पूछताछ के बाद ईडी के अफसरों ने यूबीएस, बार्क्लेज और क्रेडिट सुईस बैंकों के भारतीय अधिकारियों को तलब कर उनसे अली के खातों के बारे में जानकारी मांगी है।

दरअसल मशहूर घोड़ा व्यपारी और टैक्स चोरी का आरोपी हसन अली का मामला अब और तूल पकड़ रहा है। हसन अली से पूछताछ कर चुके एक डीसीपी के सस्पेंशन ने विवाद को और तूल दिया है। डीसीपी के सस्पेंशन के मुद्दे पर सोमवार को विपक्ष ने जमकर हंगामा किया। माना जा रहा है कि डीसीपी के जरिए कई नेताओं के चेहरे से नकाब हट सकता है।

आदर्श घोटाले के बाद हसन अली महाराष्ट्र सरकार के लिए सिरदर्द साबित हो रहा है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार हसन अली के मामले की निष्पक्ष तरीके से जांच नहीं होने दे रही है। और इसका नजीर है जीआरपी के डीसीपी अशोक देशभरतार का निलंबन। आखिर डीसीपी का गुनाह क्या था? असल में डीसीपी अशोक भरतार ने ही 2008 में फर्जी पासपोर्ट मामले में हसन अली को गिरफ्तार किया था। तब हसन अली से 1 घंटे तक पूछताछ हुई थी। इस पूछताछ में अली ने कई नेताओं के नाम लिए थे। डीसीपी अशोक देश भरतार ने उस पूछताछ का एक वीडियो सीडी बनवाया था, जो बाद में मीडिया तक पहुंच गई थी।

साफ है डीसीपी देश भरतार हसन अली मामले की जांच की अहम कड़ी थे। माना जा रहा है कि डीसीपी की पूछताछ के जरिए कई सफेदपोश नेताओं के चेहरे से नकाब उतर सकता है। फिलहाल हसन अली ईडी की हिरासत में हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत की समय सीमा 3 दिन और बढ़ा दी है। अब एक तरफ हसन अली हैं और दूसरी तरफ डीसीपी देश भरतार हैं। दोनों में से किसी एक ने भी अगर मुंह खोल दिया और नेताओं के नाम बाहर आ गए तो महाराष्ट्र सरकार की किरकिरी होने से कोई रोक नहीं पाएगा।
साभार: आईबीएन-7, Mar 22, 2011
http://khabar.ibnlive.in.com/news/50227/1


हसन अली की दौलत का राज

हसन अली का केस दिन-ब-दिन और अजीबोगरीब होता जा रहा है। पुणो स्थित घोड़ों के फार्म के मालिक पर बकाया कर की दरें नियमित रूप से बढ़ती रहीं। हाल ही में बकाया राशि में दंड की राशि भी जोड़ दी गई और उसे एक लाख करोड़ रुपयों के राउंड फिगर में तब्दील कर दिया गया।

एक लाख करोड़ रुपयों का कर बकाया होने के बावजूद अभी तक यह नहीं पता चला है कि हसन अली के स्विस बैंक खाते में पैसा कहां से आया। इस दौरान अफवाहें जंगल की आग की तरह फैलती रहीं। कुछ लोग कहते रहे कि यह पैसा महाराष्ट्र के एक प्रभावशाली नेता का है, जो इन दिनों हर किसी के निशाने पर बने हुए हैं। कुछ अन्य कहते रहे कि पैसा तमिलनाडु के एक राजनेता का है, जो इन दिनों सत्ता से बेदखल हैं।

कुछ ने दबी जुबान से यह भी कहा कि वास्तव में पैसा आंध्रप्रदेश के एक राजनेता का है, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं। जहां राम जेठमलानी अदालत में नाटकीय रूप से कह रहे हैं कि इसमें ऊपर तक के लोग शामिल हैं, वहीं आम राय यह है कि यह पैसा कई राजनेताओं और कारोबारियों का है और हसन अली उनके लिए महज एक बैंकर है।

इस फेहरिस्त में सऊदी के हथियार व्यापारी अदनान खाशोग्गी भी शामिल हैं, जिन्होंने एक बार शेखी बघारते हुए कहा था कि वे दुनिया के सबसे दौलतमंद शख्स हैं। लेकिन यह पैसा चाहे किसी का भी हो, इतना तो तय है कि वह व्यक्ति इतना ताकतवर है कि हसन अली हिरासत में होने के बावजूद मुंह पर ताला लगाए हुए है। कोई भी यह सुराग पाने में कामयाब नहीं हो पाया है कि इतना सारा पैसा आखिर आया कहां से।

लेकिन यह तो है कि टैक्स डिफॉल्टरों की सूची में हसन अली ने दिवंगत हर्षद मेहता को भी पछाड़ दिया है। एक लाख करोड़ रुपए कोई छोटी-मोटी रकम नहीं होती। खासतौर पर तब, जब उसकी बुनियाद में महज अटकलें और अनुमान हों। अभी तक न तो हसन अली और न ही उसकी दूसरी खूबसूरत बीवी रीमा के विरुद्ध कुछ साबित किया जा सका है।

जांच एजेंसियां अब इस उम्मीद में रीमा पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं कि शायद वे उसके जरिये स्विस बैंक खातों के पीछे छिपे गहरे राजों को फाश कर सकेंगी। यहां तक कि पिछले माह सर्वोच्च अदालत ने भी प्रदेश सरकार से पूछा कि हसन अली के रहस्यपूर्ण लेन-देनों के बारे में अधिक जानकारियां हासिल करने के लिए पर्याप्त प्रयास क्यों नहीं किए जा सके। हिरासत में की गई पूछताछ का भी कोई फायदा नहीं हुआ। सबसे अहम सवाल अब भी अपनी जगह पर बरकरार है : क्या यह पैसा हसन अली का है? यदि हां, तो उसे आठ अरब डॉलर कहां से मिले और किसलिए? क्या यह भुगतान के रूप में चुकाई गई रकम है? यदि हां तो किसने इतनी बड़ी रकम चुकाई और क्यों?

दंड राशि और ब्याज को एक तरफ करने के बावजूद हसन अली पर वास्तविक टैक्स क्लेम 72 हजार करोड़ रुपयों का बताया जा रहा है। यह इतनी बड़ी रकम है कि इससे भारत के छह लाख गांवों को पेयजल मुहैया कराया जा सकता है। इसके बावजूद इस व्यक्ति और उसकी ‘फनी मनी’ के पीछे छिपे रहस्यों से पर्दा उठाने के प्रयास नहीं किए गए। यह ‘फनी मनी’ इसलिए है, क्योंकि अभी तक इस बात के कोई सबूत नहीं हैं, या अगर हैं तो कम से कम उन्हें सार्वजनिक नहीं किया गया है कि वास्तव में यह सारा पैसा हसन अली का ही है। यह पैसा किसी का भी हो सकता है। और शायद ऐसा है भी।

आयकर वाले दावा करते हैं कि अगर जरा भी और देर की गई तो मामले की समय सीमा समाप्त हो जाएगी। इसका यह मतलब है कि यह मामला उससे कहीं अधिक समय से चल रहा है, जितना कि हम जानते हैं। कर संबंधी मामलों की समय सीमा इतनी आसानी से समाप्त नहीं होती। इस स्थिति तक आने में वर्षो लग जाते हैं। तो संभव है कि किसी व्यक्ति ने या तो हसन अली या फिर उन लोगों को बचाने के लिए मामले में हस्तक्षेप किया है, जिनके पैसे की वह हिफाजत कर रहा था। अगर यह सच है कि पैसा किसी राजनेता का है तो इस देरी के राजनीतिक निहितार्थ भी हो सकते हैं।

वास्तव में अगर यह मामला अदालत तक न पहुंचा होता तो हसन अली अभी मजे से घूम रहा होता। निश्चित ही दाल में कहीं कुछ काला है। इसके बावजूद मैं उस व्यक्ति की बात पर भी भरोसा करता हूं, जो यह कहता है कि उसे जान का खतरा है। उसने देखा है कि किस तरह २जी मामले के मुख्य साक्षी सादिक बाचा की रहस्यपूर्ण स्थितियों में मौत हो गई। जिस डॉक्टर ने सादिक बाचा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उसकी मृत्यु को आत्महत्या का मामला बताया था, वह अब एक चुनाव में उम्मीदवार है।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट देने के अगले ही दिन उसने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया था। क्या यह महज एक संयोग है? हो सकता है। हसन अली का गुनाह चाहे जो हो, लेकिन उसकी जान उसी दिन से खतरे में है, जिस दिन उसने एक पत्रकार को एक छोटी-सी पर्ची पर यह लिखकर दिया था कि उसे वास्तविक तथ्यों के सामने आने से पहले ही खत्म किया जा सकता है। क्या इसका मतलब यह है कि वह कुछ कहना चाहता है, लेकिन उसे कहने नहीं दिया जा रहा है?

इससे पहले कि हम हसन अली के बारे में अपना फैसला सुनाएं, हमारा पहला जिम्मा यह होना चाहिए कि हम उसकी जान की हिफाजत करें। भारत में कई मामलों का इसीलिए समाधान नहीं हो पाता, क्योंकि केस के किसी मुख्य व्यक्ति को जांच के दौरान ही ठिकाने लगा दिया जाता है। अकाल मृत्यु की स्थिति सुविधाजनक होती है। जो लोग हकीकत जानते हैं, वे मुंह पर ताला लगाकर बैठ जाते हैं। कुछ समय बाद मीडिया भी नए मामले की तलाश में जुट जाता है।

कोशिश की जानी चाहिए कि इस मामले का यह अंजाम न हो। हसन अली बुरा व्यक्ति हो सकता है। यह भी संभव है कि उसके अच्छे कनेक्शन हों। लेकिन इसके बावजूद आठ अरब डॉलर हवा से नहीं आ सकते। यह तभी संभव है जब वह किसी ऐसे व्यक्ति की ढाल बनकर खड़ा हुआ हो, जिसके बारे में उसे विश्वास है कि वह या तो उसे बचा सकता है या यदि उसने सच्चाई बयां की तो उसे जान से भी मार सकता है।
साभार: vichitra-vichitra.blogspot.in, Monday, July 18, 2011
http://vichitra-vichitra.blogspot.in/2011/07/blog-post_2839.html


हसन अली की पत्नी भी बड़ी कर चोर!

कहा जाता है कि हर सफल आदमी के पीछे किसी औरत का हाथ होता है। घोड़ों के व्यापारी हसन अली खान और उसके सहयोगियों के मामले में भी यह कहावत सच साबित होती दिख रही है। खान और उसके सहयोगी काशीनाथ तापड़िया की पत्नी इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण सूत्र के रूप में उभर रही हैं। प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग जैसी एजेंसियां हसन अली के खिलाफ कर चोरी और मनी लांड्रिंग के मामलों की जांच कर रही हैं।

हसन अली की पत्नी रहीमा हसन अली खान और तापड़िया की पत्नी चंद्रिका तापड़िया इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण लिंक हैं। इसका अनुमान आयकर विभाग द्वारा उन पर लगाए गए कर बकाया के आकलन से लगाया जा सकता है। आयकर विभाग ने जहां रहीमा खान पर 49 करोड़ रुपए के कर बकाये का अनुमान लगाया है, वहीं चंद्रिका के खिलाफ विभाग ने 2008 में 20,540 करोड़ रुपए के कर बकाए की मांग बनाई गई थी।

दिलचस्प तथ्य यह है कि चंद्रिका पर बकाया कर की राशि हसन अली के बाद दूसरे नंबर पर बैठती है। चंद्रिका पर कथित रूप से खान से संबंधित कारोबारी फर्म आरएम इन्वेस्टमेंट एंड ट्रेडिंग कंपनी प्राइवेट लि. से भी जुड़ा होने का आरोप है। इस कंपनी पर 336 करोड़ रुपए का कर बकाया है। जांच अधिकारियों का मानना है कि कई तरह के निवेश और अन्य सौदे इन दोनों महिलाओं की जानकारी में हुए और वे भी इसमें शामिल रहीं। ऐसे में इस पूरे मामले के खुलासे में इन महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका बनती है। जांच से जुड़े सूत्रों ने कहा कि इस पूरे मामले में पत्नियों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है। वे अपने पतियों द्वारा किए गए सौदों से सबसे नजदीकी से जुड़ी रहीं। खान और तापड़िया ने कई सौदों और निवेशों में उनके नाम और पहचान का इस्तेमाल किया।

सूत्रों ने दावा किया कि उनकी भूमिका से साबित हो जाएगा कि हर सफल आदमी के पीछे किसी औरत का हाथ होता है। यह मामला सफलता का नहीं, बल्कि अवैध धन, कर चोरी और मनी लांड्रिंग का है। आयकर विभाग के 2008 के आकलन आदेश के अनुसार खान की पत्नी रहीमा ने कई इम्पोर्टिड कारों की खरीद, स्विटजरलैंड और अन्य यूरोपीय देशों की यात्रा की बात भी स्वीकार की है। इसके अलावा उसने कई घोड़ों, पुणे में शानदार मकान तथा मुंबई में फ्लैट की बात भी स्वीकार की है।

आदेश में कहा गया है कि विभाग को 2007 में की गई जांच से पहले तक इनके बारे में जानकारी नहीं दी गई थी। आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय, भारतीय रिजर्व बैंक और महाराष्ट्र पुलिस के आर्थिक अपराध शाखा के दल को खान और उसकी पत्नी के एबीएन एमरो, पुणे बैंक में दो खातों की जानकारी भी मिली है। इन खातों में 2008 में 1.17 करोड़ रुपए की राशि जमा थी।
साभार: www.livehindustan.com, 27-03-11
http://www.livehindustan.com/news/desh/national/article1-Hasan-alis-wife-is-also-a-big-tax-edader-39-39-164021.html

Wednesday, August 1, 2012

भारतीय सेना में 360 करोड़ का राशन घोटाला

नई दिल्ली।। अनुशासित और ईमानदार मानी जाने वाली सेना में घोटाले के नए-नए कारनामे सामने आ रहे हैं। सेना प्रमुख को घूस की पेशकश के बाद अब सेना में राशन घोटाला का पर्दाफाश हुआ है। यह घोटाला रक्षा मंत्रालय के आंतरिक ऑडिट रिपोर्ट में सामने आया है।

सेना की ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 10 सालों में सेना में फौजियों को खाना खिलाने के नाम पर करीब 360 करोड़ रुपये का घोटाला हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय सेना में 12 लाख जवान हैं, लेकिन सेना में पिछले 10 सालों में करीब 14 लाख फौजियों को खाना खिलाने के लिए पैसा खर्च किया गया।

रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 10 सालों में करीब 4 लाख फौजियों ने खाने के पैसे लिए, वहीं करीब 10 लाख सैनिकों को खाना खिलाने पर पैसा खर्च किया गया। अहम सवाल यह है कि जहां सैनिकों की कुल संख्या ही 10 लाख है वहां पर 14 लाख सैनिकों को खाना कैसे खिलाया गया?

रिपोर्ट में सेना में हुए इस घोटाले का पर्दाफाश करते हुए इसकी जांच की सिफारिश की गई है।

साभार
नवभारत टाइम्स, नवभारतटाइम्स.कॉम, 1 Apr 2012
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/12489881.cms

महाराष्ट्र में सिंचाई विभाग का 25 हजार करोड़ का घोटाला

प्रमुख संवाददाता॥ मुंबई - बीजेपी ने महाराष्ट्र के सिंचाई विभाग में पिछले 10 साल के दौरान 25 हजार करोड़ का घोटाला होने का आरोप लगाया है। बीजेपी नेता व विधानपरिषद के नेता विपक्ष विनोद तावडे ने मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण से आग्रह किया कि वे सिंचाई पर श्वेतपत्र जारी करने का अपना वादा पूरा करें और इस मामले में एनसीपी नेताओं के दबाव में नहीं आए।

तावडे ने विदर्भ इलाके की सिंचाई परियोजनाओं को सरकार की वडनेरे समिति की रिपोर्ट दाखिले के तौर पर पत्रकारों के सामने पेश की। समिति के अनुसार, जीगांव सिंचाई परियोजना का 396 करोड़ का टेंडर निकला था, जबकि ठेकेदार को 4044 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया। इसी तरह गोसी-खुर्द का 350 करोड़ के टेंडर पर 7700 करोड़, नानी लघु तालाब के 34 करोड़ के टेंडर पर 1567 करोड़ और भिवापुर तालाब के 17 करोड़ के टेंडर पर 1038 करोड़ रुपये का भुगतान सरकार की ओर से किया गया।

उन्होंने दावा किया कि विदर्भ की ही तरह मराठवाडा, कोंकण और पश्चिम महाराष्ट्र की सिंचाई परियोजनाओं की रकम बिना नए टेंडर मंगाए कई गुना बढ़ाकर अदा की गई है। उन्होंने कहा कि करीब 66 हजार करोड़ रुपये खर्च करने के बाद महाराष्ट्र में सिंचाई बमुश्किल 0.1 प्रतिशत की ही बढ़त हो पाई है। उन्होंने सरकारी स्तर पर दाद न दिए जाने पर मुंबई उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की धमकी दी है।

साभार
नवभारत टाइम्स, May 9, 2012
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/13056250.cms

माया राज में 40 हजार करोड़ का घोटाला : अखिलेश

यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मंगलवार को आरोप लगाया कि पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने करीब 40 हजार करोड़ रुपये का वारा-न्यारा किया है। हाथी की मूर्ति से लेकर पेड़ तक, मिट्टी से लेकर लैंड अलॉटमेंट और दवा से लेकर खाद्य सामग्री तक में घोटाले पर घोटाले हुए हैं। राज्य सरकार जल्दी ही यह फैसला करेगी कि स्मारकों में मूर्तियों की स्थापना में कथित 40,000 करोड़ के घोटाले की जांच किस तरह से कराई जाए? मुख्यमंत्री ने कहा कि लोकायुक्त ने इस घोटाले में कई लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दी है। अब सरकार को यह फैसला करना है कि मूर्ति घोटाले की जांच का तरीका कैसा हो? उन्होंने कहा कि घोटाले की जड़ तक जाकर सचाई का पता लगाया जाएगा।

अखिलेश से पूछा गया था कि क्या मूर्ति घोटाले में सीबीआई जांच के आदेश दिए जाएंगे। इस पर उन्होंने कहा कि घोटाले की जांच तो की जा रही है, हम देखेंगे कि इसमें किसी दूसरी तरह की जांच की गुंजाइश कितनी है? अखिलेश ने कहा कि चुनाव के समय ही एसपी ने कहा था कि मूर्तियों की स्थापना में बड़े पैमाने पर 40,000 करोड़ का घोटाला किया गया और सरकार इस घोटाले का राजफाश करेगी। उन्होंने कहा कि पत्थर के बने हाथी से लेकर स्मारक स्थल पर लगे खजूर के पेड़ों तक की खरीद में भ्रष्टाचार किया गया।

लखनऊ पुलिस ने सोमवार को गोमती नगर के राजकीय निर्माण निगम के दफ्तर में छापा मारा। यह छापा लखनऊ और नोएडा के हाथी पार्कों में हाथियों की मूर्तियों की स्थापना में हुई कथित अनियमितताओं के सिलसिले में डाला गया। एएसपी ने बताया कि लखनऊ और नोएडा में मूर्तियां लगाने का काम ऐसे लोगों ने किया, जिन्हें इस काम में कोई महारत हासिल नहीं थी। घोटाले में शामिल राजकीय निर्माण निगम अफसरों के पासपोर्ट को जब्त किया जा चुका है।

पुलिस के मुताबिक, अब पता चला है कि मूर्ति लगाने में काम की मार्केट प्राइस से ज्यादा पेमेंट दी गई और नियमों को नजरअंदाज कर ठेके ज्यादा कीमत में दिए गए। मूर्तियों की स्थापना में करीब 58 लाख की लागत आई। राजकीय निर्माण निगम से कई अन्य दस्तावेज जुटाए जा रहे हैं, जिसके बाद स्थिति और साफ होगी।

आगरा बेस्ड स्टोन सप्लायर से धोखाधड़ी के आरोप में राजकीय निर्माण निगम के एक ठेकेदार की शनिवार की रात को हुई गिरफ्तारी के बाद निगम में छापा डाला गया। पुलिस ने चिनहट में आदित्य की मार्बल शॉप पर भी रेड डाली और वहां से मदन की ओर से सप्लाई की गई हाथी की मूर्ति बरामद की।

साभार
नवभारत टाइम्स, विजय दीक्षित, लखनऊ, 16 May 2012
http://navbharattimes.indiatimes.com/maya-secrets-of-the-40-thousand-crore-scam-akhilesh/articleshow/13153702.cms

अनाज घोटाले में 5000 FIR की जरूरत

घोटालों के इस मौसम में इस देश का सबसे बड़ा घोटाला सामने आया है। अनाज घोटाला 35 हजार करोड़ से 2 लाख करोड़ के बीच होने की आशंका जताई जा रही है। यह घोटाला पांच देशों नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान, साउथ अफ्रीका और भूटान तक फैला हुआ है। इस घोटाले में उत्तर प्रदेश के 71 जिलों में से 34 जिले शामिल हैं। इस घोटाले में साढ़े 400 उच्च सरकारी अधिकारी, मंझले-छोटे सरकारी अधिकारी और 10 हजार प्राइवेट फर्म या लोग शामिल हैं।

इस घोटाले में अगर सारी एफआईआर (FIR) करवाई जाएं तो उनकी गिनती 5000 तक पहुंचेगी। अगर यह आपको सच नहीं लग रहा है तो इसके लिए उत्तर प्रदेश के एक जिले का ही उदाहरण देना काफी होगा। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के आदेश पर जब यूपी पुलिस के फूड सेल से मामला एसआईटी (स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम) को सौंपा गया तब तक 6000 से ज्यादा लोगों के खिलाफ 63 एफआईआर दर्ज की जा चुकी थीं। इसमें 21 लोग उपजिलाधिकारी और जिला आपूर्ति अधिकारी जैसे पदों पर थे।

महाघोटाले में कब क्या हुआ
नवंबर 2004- मुख्य सचिव (फूड एंड सिविल सप्लाई) प्रशांत चतुर्वेदी ने रेलवे से बांग्लादेश और बाकी देशों को भेजने के लिए अनाज की लोडिंग के बारे में जानकारी मांगी।

दिसंबर 2004- रेलवे ने उन जिलों और स्टेशनों की एक सूची दी जहां से बांग्लादेश को अनाज भेजा जा रहा था।

2005- लखीमपुर खीरी के जिला अधिकारी एस.पी.एस. सोलंकी समेत उन अधिकारियों के नाम दिए गए जिनके खिलाफ अनाज घोटाले में शामिल होने की वजह से विभागीय कार्रवाई शुरू की गई थी।

2006- मुलायम सिंह यादव की सरकार ने मामले को आर्थिक अपराध शाखा को सौंपा। आर्थिक अपराध शाखा ने अकेले बलिया जिले में 50 से ज्यादा मामले दर्ज किए।

जून 2007- मायावती ने मामले को स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एस.आई.टी.) को सौंप दिया।

सितंबर 2007- एस.आई.टी. की रिपोर्ट से उत्तर प्रदेश सरकार को भारी नुकसान होने का पता चला।

दिसंबर 2007- मायावती सरकार ने सीबीआई जांच की सिफारिश की।

2008- सीबीआई ने केवल तीन जिलों के कुछ मामलों को अपने हाथ में लिया। विश्वनाथ चतुर्वेदी ने तेज जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की। सुप्रीम कोर्ट ने केस को इलाहाबाद हाई कोर्ट को भेजा।

3 दिसंबर 2010- इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने सीबीआई को पूरे घोटाले की जांच करने को कहा।

किसमें कितना घोटाला
बोफोर्स घोटाला- 64 करोड़ रुपए
यूरिया घोटाला- 133 करोड़ रुपए
चारा घोटाला- 950 करोड़ रुपए
शेयर बाजार घोटाला- 4000 करोड़ रुपए
सत्यम घोटाला- 7000 करोड़ रुपए
स्टैंप पेपर घोटाला- 43 हजार करोड़ रुपए
कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला- 70 हजार करोड़ रुपए
2जी स्पेक्ट्रम घोटाला- 1 लाख 67 लाख करोड़ रुपए
अनाज घोटाला- 2 लाख करोड़ रुपए (अनुमानित)

साभार
नवभारत टाइम्स, टाइम्स न्यूज नेटवर्क, परवेज इकबाल सिद्दीकी, 9 Dec 2010
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/7069382.cms

'यूपी का अनाज घोटाला 2जी से भी बड़ा'

उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के शासनकाल में अनाज घोटाले की बात उजागर होने के बाद इस मसले पर राजनीतिक लड़ाई शुरू हो गई है। केंद्र सरकार ने इस घोटाले की जिम्मेदारी पूरी तरह तत्कालीन सीएम मुलायम पर डाल दी है। हमारे सहयोगी चैनल टाइम्स नाउ के मुताबिक , देश के किसी गरीब राज्य से यह अब तक का सबसे बड़ा घोटाला माना जा रहा है। लगभग 2 लाख करोड़ रुपये के इस घोटाले में गरीबों के लिए तय अनाज को जानबूझकर और एक प्रक्रिया के तहत खुले बाजार में देश और विदेश में बेचा गया। यह घोटाला 7 साल तक चला और इसमें 5,000 एफआईआर भी दर्ज हुईं।

याचिकाकर्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी ने कहा कि लंबे समय से इस मामले को दबाने की कोशिश हो रही थी। उनके मुताबिक, 'यह घोटाला 2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन और कॉमनवेल्थ घोटाले से भी बड़ा है। इस घोटाले पर केंद्र का रिएक्शन इलाहाबाद हाई कोर्ट की ओर से इस मसले पर सख्ती दिखाने के बाद आया है।'

कोर्ट ने शुक्रवार को यूपी की जांच एजेंसियों को आदेश दिया था कि वे इस केस को सीबीआई के सुपुर्द करें और जांच का काम 6 महीने के भीतर पूरा किया जाए। माना जाता है कि यह घोटाला मुलायम के कार्यकाल में 2003 और 2007 के बीच अंजाम दिया गया।

कोर्ट की लखनऊ बेंच ने शुक्रवार को अपने आदेश में उच्च अधिकारियों को गरीबों से उनका निवाला छीनने के लिए सख्त टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा कि बेशक पहली नजर में साफ दिखता है कि गरीबों के लिए तय अनाज की स्मगलिंग की गई। बड़ी अथॉरिटी की मदद के बिना ऐसा करना मुमकिन नहीं था। अनाज को जिस तरह देश के दूरदराज इलाकों में मालगाड़ियों से पहुंचाया गया , उससे भी यह बात साबित होती है। कोर्ट ने कहा कि जब करप्शन देश के विकास पर बड़ी चोट कर रहा हो, तब जुडिशरी मूक दर्शक नहीं बन सकती।

साभार
नवभारत टाइम्स, 07 Dec 2010