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Saturday, November 7, 2015

रिजेक्ट कोयले का खेल : एसईसीएल हुआ बदहाल, प्राइवेट कंपनी हुई लाल, संचालक हुये मालामाल

छत्तीसगढ़ की ऊर्जा नगरी कोरबा में चारों ओर काले सोने का असीमित भंडार भरा हुआ है जिसके चलते काला सोने यानि कोयले पर कोल व्यापारियों और कोल माफियाओं की भी नज़र गड़ी ही रहती है। कोरबा जिले में भारत सरकार ने कोयले पर भारतीय हक के दावेदारी के चलते ही एसईसीएल का निर्माण किया ताकि भारतीय अर्थव्यवस्था को कोयले के द्वारा क्रय विक्रय से राजस्व की प्राप्ति होती रहे। भारतीय सरकार को यह अंदेशा भी नहीं रहा होगा कि एसईसीएल के उच्चाधिकारी देश के राजस्व में ही चपत लगाने लगेंगे और प्रतिदिन कई करोड़ का नुकसान पहुंचाने लगेंगे।

बताते चलें कि एसईसीएल कोरबा जिले में कोयला खान की बड़ी यूनिट है। हजारों लाखों लोगों की रोजी रोटी चलने का माध्यम भी। शासकीय उच्चाधिकारियों ने ही एक प्राइवेट कंपनी से हाथ मिला कर भारतीय सरकार को जबरदस्त तरीके से लूटना शुरू कर दिया है। यह लूट खसोट दस-बारह वर्षों से भी अधिक समय से लगातार और प्रतिदिन चल रही है। उच्चाधिकारियों की मिलीभगत से ही आज तक कोई, इस कंपनी की ओर आंख उठा कर भी नहीं देख पाया है।

कई बार जांच हुई जिसमें यह सत्य उजागर हुआ मगर राज्य सरकार और जांच एजेंसियां दोनों ही बौने साबित हो गए एसईसीएल के भ्रष्ट उच्चाधिकारियों और इन प्राइवेट कंपनियों के सामने। इसलिए राज्य सरकार से उम्मीद करना बेकार ही है। प्राइवेट कंपनियों पर एसईसीएल के उच्चाधिकारी की अधिक मेहरबानियां है। वैसे भी एसईसीएल जब खुद लुटने को तैयार बैठी है तो इसमें प्राइवेट कंपनी वाले की क्या गलती। क्योंकि प्राइवेट कंपनी को मौका दिया गया होगा तब ही तो उसने चौका मारा होगा।

एक हिसाब से देखा जाए तो असली गुनहगार तो एसईसीएल के बिकाऊ उच्चाधिकारी हैं। गौर करने वाली बात ये है कि अगर भारतीय सरकार अपने पर आ जाए तो एसईसीएल के उच्चाधिकारियों को और प्राइवेट कंपनियों को 24 घंटे में लाइन पर ला सकती है, मगर अफसोस यही है कि सभी ढिंढोरा पीटते हैं भ्रष्टाचार को समाप्त करने का मगर कोई भ्रष्टाचार से मुक्त होना नहीं चाहता है। ऊपर से लेकर नीचे तक सब भ्रष्टाचार की एक माला के ही मोती है और सभी एक ही धागे में गुधे हुए हैं भले सबकी बनावट व रंग अलग अलग है।

वर्ष 2003 में कांग्रेस पार्टी से तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी द्वारा एक आर्यन के द्वारा हिन्डालको को बेचे गए 4 लाख टन कोयले की जांच सीबीआई द्वारा कराने का आग्रह किया गया था। इसके लिए बकायदा पत्र लिखकर उन्होंने अपनी बात रखी थी, मगर जल्द ही कांग्रेस की उनकी सरकार चली गई। इस पर आज भी भूतपूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी अपनी बात रखते हैं और कार्यवाही न करने का पूरा जिम्मेदार रमन सरकार को बताते हैं।

कोरबा जिले में एसईसीएल और आर्यन के साथ मिलकर कोयले का ऐसा रोचक खेल खेला जाता है जो कि यकीनन कौतूहल का विषय है। वैसे काले सोने के खेल में करोड़ों रुपयों के वारे न्यारे होतें हैं, दरअसल इस खेल की पोलपट्टी तब खुली जब खनिज विभाग के अधिकारियों ने राजधानी रायपुर में चार ट्रकें पकड़ी थी। पकड़े जाने पर ट्रक चालकों ने खनिज विभाग के अधिकारी को बताया था कि इन ट्रकों में रिजेक्ट कोयला है मगर जब जांच की गई तब पता चला कि कोयला अच्छी गुणवत्ता वाला स्टीम कोयला है। खनिज विभाग के अधिकारियों ने ट्रकों को जब्त कर दिया था परंतु राजनीतिक दबाव के चलते मामले को रफा दफा कर दिया गया था।
   
इन सभी कंपनियों को जान लेते हैं -

साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एसईसीएल) का परिचय :
 
साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड देश की सबसे बड़ी कोयला उत्पादक कंपनी है। साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड के कोयला भंडार दो राज्यों में फैले हुए हैं, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश। कोयला प्लांट के अलावा छत्तीसगढ़ राज्य में मध्य प्रदेश राज्य में कंपनी के 35 माइंस और 54 खानों के साथ कुल 89 खानों में कोयले का काम कर रही है। कोल इंडिया लिमिटेड से पट्टे के आधार पर पश्चिम बंगाल में दनकुनी कोयला परिसर (डीसीसी)। प्रभावी प्रशासनिक नियंत्रण और संचालन के लिए खानों को तीन कोलफील्ड्स में वर्गीकृत किया गया है।

13 ऑपरेटिंग क्षेत्रों के साथ

मध्य भारत कोलफील्ड्स (सीआईसी),
कोरबा कोलफील्ड्स और
मंड-रायगढ़ कोलफील्ड्स।
      
ए - मध्य भारत कोलफील्ड्स
चिरमिरी क्षेत्र
बैकुण्ठपुर क्षेत्र
बिश्रामपुर क्षेत्र
हसदेव एरिया
भटगांव क्षेत्र
जमुना और कोटमा क्षेत्र
सोहागपुर क्षेत्र
जोहिल्ला जोहिल्ला क्षेत्र
    
बी - कोरबा कोलफील्ड्स
कोरबा क्षेत्र
कुसमुण्डा क्षेत्र
दीपिका क्षेत्र
गेवरा क्षेत्र
   
सी - मंड-रायगढ़ कोलफील्ड्स
रायगढ़
जलकर कोयला संयंत्र परिसर
धनकुनी कोयला संयत्र, पश्चिम बंगाल।

आर्यन कोल बेनिफिकेशन (एसीबी) परिचय :
मेसर्स आर्यन के सन् 1998-99 में 12 एकड़ में वाशरी स्थापित करने हेतु दी गई थी। यह भूमि सीएमपीडीआई के अप्रूव्ड प्लान उपरोक्त भूमि ओवर बर्डन के लिए आरक्षित थी, इसके अलावा एसईसीएल की प्रगति नगर कालोनी इस वाशरी से सिर्फ 100 मीटर दूरी पर स्थित थी, जिसमें 700 परिवार रहते हैं। अतएव उपरोक्त कारणों से यह भूमि उपयुर्क्त नहीं थी किन्तु गेवरा-दीपिका खदान के बीच में स्थित होने से कोयले की हेराफेरी की दृष्टि से अत्यधिक उपयुर्क्त थी। अतएव सभी नियमों को ताक पर रखकर भूमि आवंटित कर दी गई।

एसटीसीएलआई से परिचय :
सर्वेस कोल इंडिया लिमिटेड (एसटीसीएलआई) कोल वाशरी का संचालन हैदराबाद के डॉक्टर मोहन राव द्वारा किया जाता है जो कि अप्रवासी भारतीय बताए जाते हैं।

रिजेक्ट कोयले की घटना पर नज़र डालते हैं :

दरअसल खनिज विभाग को सूचना प्राप्त हुई थी कि कोल वाशरी से 25 ट्रक कोयला लदाकर निकले हैं जिनमें रिजेक्ट कोयले के नाम पर उच्च गुणवत्ता वाला स्टीमकोयला लादा गया है। जिससे जिला खनिज अधिकारी महिपाल सिंह कंवर के नेतृत्व में सुबह तड़के पाली मुख्य मार्ग पर खनिज जांच नाके पर ट्रकों को रोका गया था, जिसमें 4 ट्रकें संदिग्ध पाई गई थी। ट्रक क्रमांक सीजी 10 ए 6211 (चालक फूलचंद), सीजी 10 ए 6212 (चालक महेश पाल), सीजी 10 ए 5551 (चालक दशरथ सिंह) और सीजी 10 ए 5559 (चालक शिवदास) पकड़ी गई थी। ट्रकों के चालकों ने बताया था कि रतिजा स्थित एसईसीएल कोल वाशरी से कोयला लादा गया था। सभी ट्रक दीपिका के निकट झाबर से संचालित वर्धमान रोड लाइसं की थी। सभी ट्रक मुनगाडीह स्थित खनिज विभाग के जांच नाके ले गए तथा सुरक्षा में खड़ा किया। चारों ट्रक चालकों का बयान भी लिया।

जांच के लिए रोके गए चारों ट्रकों और उसमें लदे कोयले की जब्ती के लिए पंचनामा तक बनाया गया था और चारों ट्रकों से सेम्पल लेकर बिलासपुर स्थित अधिकारिक प्रयोगशाला में जांच के लिए भेजा गया था, जिसकी पुष्टि खनिज अधिकारी ने की थी। जिन दोनों कोल वाशरियों से कोयले का परिवहन किया गया था उनको कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाबतलब किया और जांच रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई करने की योजना थी।

विभाग ने जब्त किए कोयले का मूल्य अनुमानित 59 हज़ार से अधिक बताया था। प्रत्येक ट्रक में 25-25 टन कोयला लदा हुआ पाया गया था। इसमें यह भी ज्ञात हुआ था कि कोयला, एसईसीएल की कतिपय दीपिका खदानों से रिजेक्ट श्रेणी के नाम पर लिया गया था, इसलिए  एसईसीएल की भूमिका इसमें संदिग्ध मानी गई थी।

ट्रक चालकों ने कहा था कि कुछ ट्रक बिलासपुर के परसदा में पहुंचाना था तथा कुछ ट्रकें महावीर कोल ट्रेडर्स, धरसींवा, रायपुर में पहुंचाना था। तथा नाके पर खनिज विभाग के पहुंचने से पहले ही 21 ट्रकें निकल चुकी थी और इसीलिए मात्र 4 ट्रकें ही पकड़ में आई थी। यह पहला मौका था जब कोल वाशरी से रिजेक्ट कोयले की आड़ में होने वाली अफरा तफरी पर खनिज विभाग ने कार्रवाई की थी जबकि ऐसी शिकायतें खनिज विभाग के पास बराबर मिलती थी और आज भी मिल रही है मगर कार्यवाही एक बार के बाद दोबारा कभी भी नहीं की गई।

काबिलेगौर है कि एसटीसीएलआई कोल वाशरी से रवाना हुई ट्रकों में 3 ट्रकों के चालक के पास मिले कागजातों में खनिज विभाग द्वारा कोल वाशरी को रिजेक्ट कोल के परिवहन हेतु जारी किए गए ट्रांजिट पास क्रमांक 426/54, 426/62, 426/72 व सभी 8 फरवरी 2007 और एसीबी कोल वाशरी से निकली ट्रक के चालक से मिले थे।

-नियमों के अनुसार शिकायत सही पाई जाती तो इस राशि के अलावा दंड भी अधिभारित किया जाता। मगर राजनीतिक दबाव व भ्रष्टाचार के चलते सेटिंग करके मामले को रफादफा कर दिया गया था। महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि रिजेक्ट कोल के नाम पर खदानों से निकला कोयला रूपये 80/- प्रतिटन बेचा जाता है और वहीं धुला अथवा नंबर-1 के कोयले की कीमत 4 हजार रुपये प्रतिटन से भी अधिक है।

-रिजेक्ट कोयले के खेल में एमओयू का खुला उल्लंघन किया गया था। क्योंकि जानकारी के मुताबिक, एसीबी वाशरी के संचालन हेतु एसईसीएल तथा वाशरी प्रबंधन के मध्य जो एमओयू साइन हुआ था, उसकी शर्तों में यह साफतौर पर लिखा हुआ है कि "वाशरी वाश कोल तथा रिजेक्ट कोल को उसी पार्टी को आपूर्ति करेगी। वाशरी न तो वाश कोल और न ही रिजेक्ट कोल को किसी अन्य पार्टी को बेच सकती है। इस तरह से यह जो प्रकरण सामने आया, वह साफतौर पर यह बताता है कि एमओयू का वाशरी प्रबंधन द्वारा खुला उल्लंघन किया गया था। मगर इस उल्लंघन पर एसीबी और एसटीसीएलआई वाशरी के प्रबंधन ने इस पर कभी कुछ भी नहीं बोलते हैं।

एक नज़र महिपाल सिंह कंवर, जिला खनिज अधिकारी, कोरबा के बयान पर डालते हैं जिनमें उन्होंने बताया था कि वाशरी से भेजे जा रहे कोयले में रिजेक्ट कोयले की आड़ में अफरा तफरी की शिकायत मिली थी, जिस पर कार्रवाई की गई थी। जांच में प्रथम दृष्टया शिकायत तथ्यपूर्ण प्रतीत हुई थी। जांच हेतु सेम्पल की रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। वर्तमान में खान एवं खनिज अधिनियम की धारा 21 के तहत अवैध परिवहन का प्रकरण दर्ज किया गया था। कोयले से भरे ट्रक जब्त किए गए थे। एसीबी तथा एसटीबीएसईएस कोल वाशरी को शो काज नोटिस भी जारी किया गया था। मगर कार्यवाही इसके आगे नहीं बढ़ पाई। क्यों नहीं बढ़ पाई? इसका जवाब वो नहीं दे पाए। पर आप इतने समझदार तो होंगे ही कि जवाब खुद समझ जायेंगे।
साभार -
रायपुर
कोरबा 24 अक्टूबर 2015 (जावेद अख्तर).
http://www.khulasatv.com/2015/10/26_25.html#

Tuesday, September 23, 2014

ज्वाइंट वेंचर के नाम पर एक और कोयला घोटाला

मान लीजिए, आप दावत देना चाहते हैं, उसके लिए राशन एवं अन्य आवश्यक सामान खरीद कर लाते हैं, बावर्ची को बुलाते हैं और उससे भोजन तैयार करने को कहते है. इस काम के बदले बावर्ची आपसे एक तयशुदा रकम लेता है. यह तो हुई एक आम कहानी. अब एक खास कहानी. मान लीजिए, बावर्ची आपसे कहे कि वह भोजन तैयार करने का मेहनताना तो लेगा ही, साथ ही तैयार भोजन का पचास फ़ीसद या उससे भी ज़्यादा हिस्सा अपने साथ ले जाएगा, तो जाहिर है कि आप ऐसी शर्त कभी नहीं मानेंगे, क्योंकि कोई भी समझदार आदमी बावर्ची को भोजन तैयार करने का मेहनताना तो दे सकता है, पर उसके साथ 50 फ़ीसद भोजन नहीं बांट सकता.

लेकिन, एक लाख छियासी हज़ार करोड़ रुपये के कोयला घोटाले के बाद भी चल रहे एक और कोयला घोटाले में यही शर्तें लागू हैं. नतीजतन, कई राज्य सरकारें हज़ारों करोड़ रुपये का नुक़सान जानबूझ कर उठा रही हैं. वे ज्वाइंट वेंचर बनाकर निजी कंपनियों को फ़ायदा पहुंचा रही हैं.

यह पूरी कहानी समझने के लिए दो उदाहरण लेते हैं, राजस्थान एवं छत्तीसगढ़ का. समझते हैं कि राजस्थान एवं छत्तीसगढ़ में अडानी और ज्वाइंट वेंचर के जरिये हज़ारों करोड़ रुपये के कोयले की लूट कैसे हो रही है.

सबसे पहले बात करते हैं छत्तीसगढ़ सरकार की.
केंद्र सरकार ने कई राज्य सरकारों को कोल ब्लॉक आवंटित किए थे. उक्त आवंटन इसलिए किए गए थे, ताकि राज्य सरकारें लगभग मुफ्त में मिले कोयले से सस्ती बिजली का उत्पादन करें और उससे आम आदमी को फ़ायदा मिल सके. लेकिन, इसके बिल्कुल उलट हो रहा है. राज्य सरकार यहां भी निजी कंपनियों के चंगुल से बाहर नहीं निकल सकीं.

छत्तीसगढ़ स्टेट पावर जेनरेशन कंपनी लिमिटेड (सीएसपीजीसीएल) को 2006 में भारत सरकार के कोयला मंत्रालय द्वारा मारवा थर्मल पावर प्रोजेक्ट के लिए परसा कोल ब्लॉक आवंटित किया गया.

2012 तक 1549.06 करोड़ रुपये का ऩुकसान
पारसा कोल ब्लॉक में 172.30 मीट्रिक टन कोयला है. एसईसीएल ने एफ ग्रेड की क़ीमत 570 रुपये/टन, ई ग्रेड की क़ीमत 730 रुपये/टन और डी ग्रेड की क़ीमत 880 रुपये/टन निर्धारित की थी. यानी एफ ग्रेड की क़ीमत आधार बनती, तो डी ग्रेड के कोयले पर 310 रुपये/टन, ई ग्रेड के कोयले पर 160 रुपये/टन की बचत सरकार को होती, लेकिन कोल प्राइसिंग की शर्तें बदलने से सरकार को नुक़सान हुआ. दरअसल, टेंडर के प्राइस खोले जाने से पहले सीएसपीजीसीएल ने टेंडर के लिए आवेदन करने वाली कंपनियों की बैठक बुलाई थी, जिसमें एईएल ने कहा कि निकाले जाने वाले कोयले की वास्तविक श्रेणी के आधार पर कोयला देने की क़ीमत तय हो.

इससे हुआ यह कि एफ ग्रेड वाली शर्त बदल गई. चूंकि इस इलाके में डी और ई ग्रेड का कोयला ज़्यादा है और उसकी क़ीमत एफ ग्रेड से ज़्यादा होती है. अडानी को वास्तविक श्रेणी के कोयले का मूल्य मिला, न कि पहले की शर्त के मुताबिक सभी श्रेणी के कोयले के लिए एफ ग्रेड का मूल्य. सीएसपीजीसीएल ने अडानी इंटरप्राइजेज लिमिटेड के कहे अनुसार कोल माइनिंग शुल्क के भुगतान संबंधी शर्त में संशोधन कर दिया.

इसके अनुसार जिस श्रेणी का कोयला निकाला जाएगा, उसी श्रेणी के कोयले की एसईसीएल द्वारा तय क़ीमत के आधार पर माइनिंग शुल्क दिया जाएगा. नतीजतन सीएजी के मुताबिक, राज्य सरकार को 1549.06 करोड़ रुपये का नुक़सान उठाना पड़ा. हालांकि सीएजी की यह रिपोर्ट 2012 की है और जेवी के तहत यह खेल अभी तक चल रहा है. इस हिसाब से यह नुक़सान अब तक क़रीब पांच हज़ार करोड़ रुपये के आंकड़े को छू चुका होगा.

सीएसपीजीसीएल ने अपने बोर्ड ऑफ डायरेक्टर की बैठक, जो जून 2008 में हुई थी, में एक फैसला लिया. यह फैसला था ज्वाइंट वेंचर (जेवी) बनाने का, ताकि आवंटित ब्लॉक से कोयले का खनन किया जा सके. फरवरी 2009 में कंपनी ने जेवी पार्टनर के लिए टेंडर निकाला. टेंडर की शर्तों के मुताबिक, जेवी पार्टनर वही हो सकता था, जो कोल इंडिया लिमिटेड या साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड के कोयले की क़ीमत से कम क़ीमत पर कोयला दे. एसईसीएल (साउथ ईस्टर्न कोलफिल्ड लिमिटेड), एमएमटीसी (मेटल्स एंड मिनरल्स ट्रेडिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड) और एईएल (अडानी इंटरप्राइजेज लिमिटेड) ने जेवी के लिए आवेदन किया.

ग़ौरतलब है कि एसईसीएल एवं एमएमटीसी भारत सरकार की कंपनियां हैं और अडानी इंटरप्राइजेज एक निजी कंपनी है, जिसके मालिक गौतम अडानी हैं. अंत में 19 अक्टूबर, 2009 को अडानी इंटरप्राइजेज लिमिटेड (एईल) को जेवी पार्टनर चुन लिया गया. अडानी ने सीआईएल एवं एसईसीएल के कोयले की क़ीमत से तीन प्रतिशत कम क़ीमत पर कोयला देने की बात कही थी.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका संख्या 120/2012 पर सुनवाई करते हुए बीते 25 अगस्त को अपना फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने 1993 से 2010 के बीच हुए सारे कोल ब्लॉक आवंटन रद्द कर दिए. अपने 163 पेज के ़फैसले में अदालत ने कहा है कि यह कोल माइंस नेशनलाइजेशन एक्ट के ख़िलाफ़ है कि केंद्र सरकार राज्य को कमर्शियल माइनिंग की अनुमति दे. चौथी दुनिया से बात करते हुए एनर्जी एक्सपर्ट एवं सामाजिक कार्यकर्ता सुदीप श्रीवास्तव कहते हैं कि जब सुप्रीम कोर्ट ने सारे कोल ब्लॉक आवंटन अवैध ठहरा दिए हैं, तो ऐसे में राज्य सरकार द्वारा किए गए सारे ज्वाइंट वेंचर और एमडीओ कांट्रैक्ट भी अपने आप अवैध माने जाएंगे.

इस हिसाब से देखें, तो राजस्थान एवं छत्तीसगढ़ समेत अन्य राज्य सरकारों द्वारा निजी कंपनियों के साथ बनाए गए ज्वाइंट वेंचर्स को तत्काल प्रभाव से काम बंद कर देना चाहिए. साथ ही सीएजी को यह पूरा मामला इकट्ठा करके बताना चाहिए कि ज्वाइंट वेंचर के नाम पर इन निजी कंपनियों ने कितने हज़ार या कितने लाख करोड़ रुपये का चूना इस देश को लगाया है. यह इसलिए भी ज़रूरी है, क्योंकि अकेले छत्तीसगढ़ के लिए सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2012 तक छत्तीसगढ़ सरकार को क़रीब 1550 करोड़ रुपये का ऩुकसान हो चुका है.

ऐसे में अगर अन्य राज्यों में ज्वाइंट वेंचर के जरिये हुए ऩुकसान को, वह भी आज की तारीख तक, जोड़ दिया जाए, तो नुक़सान का यह आंकड़ा बहुत बड़ा हो सकता है.

अब असल कहानी इसके बाद शुरू होती है.
जुलाई 2010 में छत्तीसगढ़ स्टेट पावर जेनरेशन कंपनी लिमिटेड (सीएसपीजीसीएल) और अडानी इंटरप्राइजेज लिमिटेड (एईएल) के बीच एक ज्वाइंट वेंचर बना, जिसका नाम है, सीएसपीजीसीएल एईएल पारसा कोलियरीज लिमिटेड. इस जेवी में सीएसपीजीसीएल के पास 51 फ़ीसद शेयर थे और एईएल के पास 40 फ़ीसद.

आश्‍चर्य की बात यह है कि सीएसपीजीसीएल को कोल ब्लॉक मुफ्त में मिला था, उसे केवल खनन करके कोयला बाहर निकालना था. जाहिर है, यह काम कोई भी खनन कंपनी खनन की क़ीमत लेकर कर सकती थी, लेकिन सीएसपीजीसीएल ने कोयले के बाज़ार भाव पर अडानी इंटरप्राइजेज लिमिटेड से समझौता करके ज्वाइंट वेंचर बनाया, साथ ही उसे 40 फ़ीसद शेयर भी दे दिए और अपना ही कोयला उसने अडानी से बाज़ार भाव से स़िर्फ तीन फ़ीसद कम क़ीमत पर खरीदा. यानी अडानी को इस पूरे मामले में बिना कोल ब्लॉक मिले, स़िर्फ खनन करने के काम से वह फ़ायदा मिला, जो राज्य सरकार मुफ्त में मिले कोल ब्लॉक से नहीं उठा सकी. जाहिर है,

इस हिसाब से अगर सीएजी नुक़सान का अंदाजा लगाए, तो यह नुक़सान हज़ारों करोड़ का हो सकता है. ऐसे में सवाल उठता है कि इस तरह के ज्वाइंट वेंचर के पीछे राज्य सरकार की भूमिका क्या थी? सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि एक बार जब टेंडर की शर्त में एफ ग्रेड कोयले की क़ीमत को आधार बना दिया गया, तब अडानी इंटरप्राइजेज लिमिटेड के कहने पर संशोधन क्यों किया गया?

सीएजी ने बताया है कि सीएसपीजीसीएल को यह जानकारी थी कि उसके पास डी और ई ग्रेड कोयले की मात्रा अधिक है. इसका मतलब यह हुआ कि सरकार ने जानबूझ कर, टेंडर में पहले बनाए गए एफ ग्रेड कोयले की क़ीमत (जो कम होती है) के आधार को अडानी के कहने पर बदल दिया. जाहिर है, इससे रमन सिंह सरकार की मंशा पर भी सवाल उठता है कि आख़िर किसके दबाव में रमन सिंह सरकार ने टेंडर के नियमों में फेरबदल किया?

ज्वाइंट वेंचर के नुक़सान
  • अगर जेवी की ज़रूरत थी, तो यह कोयला निकालने वाली कंपनी के साथ होना चाहिए.
  • समझौता खनन लागत पर होना चाहिए था, न कि बाज़ार भाव पर.
  • कोल ब्लॉक मुफ्त मिला, फिर भी सरकार ने बाज़ार भाव से स़िर्फ तीन प्रतिशत कम क़ीमत पर अपना ही कोयला अडानी से खरीदा.
  • जो मुनाफ़ा सरकार को होना चाहिए था, वह अडानी के खाते में चला गया.
  • प नतीजतन, सरकार को नुक़सान उठाना पड़ा और जनता को सस्ती बिजली भी नहीं मिली.

अब जरा एक नज़र राजस्थान विद्युत ऊर्जा निगम लिमिटेड (आरवीयूएनएल, राज्य सरकार का एक उपक्रम) पर भी डालते हैं.

छत्तीसगढ़ जैसा ही एक ज्वाइंट वेंचर राजस्थान विद्युत ऊर्जा निगम लिमिटेड ने भी अडानी इंटरप्राइजेज के साथ किया है. इसकी भी कहानी बहुत हद तक छत्तीसगढ़ जैसी है.

सर्वविदित है कि कोयला मंत्रालय राज्यों को सस्ती बिजली के उत्पादन के लिए कोल ब्लॉक देता है. 2007 में कोयला मंत्रालय ने राजस्थान विद्युत ऊर्जा निगम लिमिटेड को भी दो कोल ब्लॉक दिए थे, ये कोल ब्लॉक भी छत्तीसगढ़ में स्थित हैं. छत्तीसगढ़ के हसदेव में दो कोल ब्लॉक-पारसा ईस्ट और केंटे बेसिन आरवीयूएनएल को आवंटित किए गए थे. आरवीयूएनएल ने भी बजाय स़िर्फ खनन का काम कराने (खनन की क़ीमत देकर) के अडानी के साथ ज्वाइंट वेंचर किया. अच्छा तो यह होता कि राजस्थान विद्युत ऊर्जा निगम लिमिटेड (आरवीयूएनएल) खुद या किसी सरकारी एजेंसी से कोल माइनिंग का काम कराता. मान लीजिए, यह भी संभव नहीं था, तो राजस्थान विद्युत ऊर्जा निगम लिमिटेड यह काम किसी ऐसी निजी कंपनी से कराता, जिसे केवल खनन क़ीमत यानी माइनिंग चार्ज देना पड़ता.

जानकारी के मुताबिक, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. इसके उलट, आरवीयूएनएल ने 2008 में अडानी इंटरप्राइजेज से समझौता किया और दोनों ने मिलकर एक ज्वाइंट वेंचर बनाया, जिसका नाम था, पारसा केंटे बेसिन कोलियरीज लिमिटेड. इसके बाद अडानी इंटरप्राइजेज की सहायक कंपनी अडानी माइनिंग प्राइवेट लिमिटेड ने पारसा केंटे बेसिन कोलियरीज लिमिटेड (पीकेसीएल) के साथ माइनिंग के लिए एक समझौता किया. प्राप्त जानकारी के मुताबिक, इस ज्वाइंट वेंचर में 74 फ़ीसद हिस्सेदारी अडानी को मिली और 26 फ़ीसद हिस्सेदारी आरवीयूएनएल को. आप खुद अंदाजा लगाइए कि जब कोल ब्लॉक आरवीयूएनएल को सस्ती बिजली बनाने के लिए लगभग मुफ्त मिले थे, तब ऐसे में 74 फ़ीसद शेयर अडानी को क्यों दे दिए गए?

इस ज्वाइंट वेंचर के मुताबिक अडानी के हिस्से में भूमि अधिग्रहण, माइनिंग, कोल वाशरी प्लांट की स्थापना, ट्रांसपोर्टेशन के लिए रेल लाइन (सरगुजा रेल कॉरीडोर) बिछाने और कोल वाशरी रिजेक्ट्स का (निम्नस्तरीय कोयला) खुद के पावर प्लांट के लिए इस्तेमाल करने की बात थी. इन दोनों कोल ब्लॉक की क्षमता 450 मिलियन टन है.

अब आप यह समझिए कि आख़िर कोयले की लूट का यह खेल कैसे खेला गया? जानकारी के मुताबिक, अडानी माइनिंग प्राइवेट लिमिटेड को कोयला खनन का खर्च 250 रुपये प्रति टन आता है. अडानी माइनिंग इसे ज्वाइंट वेंचर पीकेसीएल को बेचती है 675 रुपये प्रति टन के हिसाब से. इसके बाद जेवी यही कोयला आरवीयूएनएल को प्रति टन 736 रुपये के हिसाब से बेचता है. यह बाज़ार मूल्य (कोल इंडिया के रेट) से 64 रुपये यानी 8 फ़ीसद कम है. यही 64 रुपया मुनाफ़ा है इस जेवी का.

इस मुना़फे में से 74 फ़ीसद अडानी और 26 फ़ीसद आरवीयूएनएल का है. यानी आरवीयूएनएल के हिस्से में मुनाफ़ा आता है प्रति टन 16 रुप. दूसरी तरफ़ अगर आरवीयूएनएल खनन लागत के आधार पर कोयला लेती, तो उसे किसी भी खनन कंपनी को प्रति टन कोयले के लिए स़िर्फ 250 रुपये प्रति टन देना पड़ता. यानी अभी खरीदे जा रहे कोयले की क़ीमत के मुकाबले 500 रुपये प्रति टन से अधिक का फ़ायदा होता. लेकिन, ज्वाइंट वेंचर की यही महिमा है कि आरवीयूएनएल अपना ही कोयला किसी और से 500 रुपये प्रति टन अधिक देकर खरीद रहा है.

जाहिर है, सरकार या सीएजी इस मसले पर अभी भी गंभीरता से नहीं सोच रही है, लेकिन ज्वाइंट वेंचर के इस खेल को लेकर सवाल तो उठते ही हैं. एक सबसे बड़ा सवाल है कि अडानी को किस आधार पर छत्तीसगढ़ और राजस्थान सरकार ने क्रमश: 49 एवं 74 फ़ीसद शेयर दे दिए. लगभग मुफ्त में मिले कोल ब्लॉक के खनन के लिए (अगर यह तर्क मान लिया जाए कि राज्य सरकार खनन का काम करने में असमर्थ थी) अगर ज्वाइंट वेंचर की ज़रूरत थी, तो यह खनन लागत के आधार पर क्यों नहीं बनाया गया?

जो मुनाफ़ा इन राज्य सरकारों को हो सकता था, वह किसी निजी कंपनी को क्यों दे दिया गया? ऐसे में यह ज़रूरी है कि सीएजी सभी राज्य सरकारों (जहां भी ऐसे ज्वाइंट वेंचर बने हैं) का पूरा ऑडिट करके वास्तविक नुक़सान की गणना करे और यह बताए कि अब तक कोयला लूट के इस नए तरीके से देश को कितने रुपये का नुक़सान हुआ है.

सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या केंद्र सरकार लूट के इस नए और अनोखे तरीके की जांच अपनी ओर से पहल करके कराएगी या वह एक और सीएजी रिपोर्ट का इंतज़ार करेगी?

साभार:
September 22nd, 2014
- See more at: http://www.chauthiduniya.com/2014/09/joint-vencher-ke-naam-per-ek-or-koyla-ghotala.html#sthash.pgwCJtlm.dpuf