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Tuesday, June 18, 2013

भूखंड घोटालों का नोएडा-6


965 करोड़ का घोटाला

जून 2012 में नोएडा विकास प्राधिकरण के चीफ इंजीनियर यादव सिंह का किया घोटाला बड़ा रूप लेने लगा। घोटाले में यादव सिंह के बाद नोएडा प्राधिकरण के सीओ कैप्टन एसके द्विवेदी और चेयरमैन मोहिंदर सिंह का नाम भी जुड़ा। घोटाले का खुलासा होने के बाद यादव सिंह ने आचार संहिता लगने से ठीक पहले आठ दिनों में ही 965 करोड़ का घोटाला कर डाला था।

नोएडा प्राधिकरण का सालाना बजट लगभग 2,000 करोड़ का है लेकिन तत्कालिक बसपा सरकार के चहेते अधिकारी यादव सिंह ने आला अफसरान से मिल कर लगभग 1,000 करोड़ रुपए की जमीन में हेराफेरी की। घोटाले में तिरुपति कंस्ट्रक्शंस और जीएसपी कंस्ट्रक्शंस के नाम हैं। दोनों कंपनियों को नोएडा अथारिटी ने काली सूची में डाल दिया है।

यादव पर आरोप है कि कुछ ठेकेदारों से मिल कर 200 करोड़ का घोटाला किया है। ये बात भी सामने आई कि यादव ने बिना काम के ही ठेकेदारों को भुगतान किया था। ये भुगतान भी 964 बांड द्वारा 200 करोड़ का था।

Tuesday, June 11, 2013

भूखंड घोटालों का नोएडा-5



1,800 बीघा जमीन गायब 350 करोड़ रुपए की


नोएडा में करोड़ों की सरकारी जमीन का एक और घोटाला सितम्बर 2012 में खुल कर सामने आया था। जांच से पता चला है कि ग्रेटर नोएडा में 1800 बीघा जमीन ही सरकारी रिकॉर्ड से गायब हो गई है। इस सरकारी जमीन का बाजार भाव करीब 350 करोड़ रु आंका गया है। सरकारी जमीन की इस धांधली में अफसरों और किसानों की मिलीभगत सामने आई है।

Sunday, May 26, 2013

भूखंड घोटालों का नोएडा-4

आईएएस को सजा नेताओं को मजा


1994 में घोटाला तब हुआ था, जब नीरा यादव नोएडा की मुख्य कार्यकारी अधिकारी थीं। इस मामले में नोएडा एंटरप्रेन्योर्स एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने नीरा पर भूखंड आवंटन में अनियमितताएं बरतने के आरोप की जांच कर रपट दर्ज की थी। सीबीआई ने कोर्ट में दो अलग-अलग आरोप पत्र दाखिल किए थे। दूसरे आरोप पत्र में नीरा पर आरोप लगे कि उन्होंने अपनी दो बेटियों सुरुचि और संस्कृति के नाम व्यावसायिक भूखंड आवंटित करवाए थे। दोनों बेटियों का कारोबार दिखाया जबकि जांच में पता चला कि तब सुरुचि दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज में और संस्कृति किसी ब्रितानी कॉलेज में पढ़ रही थीं।

नोएडा भूखंड घोटाले का खुलासा होने पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 26 फरवरी 1998 को सीबीआई ने मामला दर्ज किया। मामला नोएडा अथॉरिटी की तत्कालीन सीईओ नीरा यादव और अन्य के खिलाफ दर्ज हुआ। 16 अक्तूबर 2002 को सीबीआई ने आरोप पत्र अदालत में दाखिल किए। नीरा के साथ तत्कालीन डिप्टी सीईओ आईएएस राजीव कुमार भी आरोपी बने। मामला गाजियाबाद में सीबीआई के विशेष जज एस. लाल की अदालत में चला।

जांच में यह भी पता चला था कि नीरा ने खुद के नाम भी प्लॉट आवंटित कराया था, जिसे बाद में दूसरे सेक्टर में बदला भी था। नीरा तब नोएडा अथॉरिटी की अध्यक्ष थीं। 7 दिसंबर 2010 को विशेष सीबीआई अदालत ने नीरा और फ्लेक्स ग्रुप इंडस्ट्रीज के मालिक अशोक चतुर्वेदी को 1994 के नोएडा जमीन घोटाले में दोनों को चार-चार साल कैद की सजा दी थी। नीरा पर अवैध रूप से नोएडा में फ्लैक्स इंडस्ट्री को 20 हजार और आठ हजार मीटर जमीन दी थी।

आईएएस राजीव कुमार पर आरोप था कि पहले उन्हें भूखंड संख्या बी-86/51 दिया था। इसे उन्होंने ए-36/44 में तब्दील करवाया। इसे भी 27/14ए में तब्दील किया। 300 मीटर के इस भूखंड के पास 105 मीटर की अतिरिक्त जमीन भी अपने नाम दर्ज करवा ली। नियमों को ताक पर रख कर फ्लेक्स ग्रुप को सेक्टर 51 में ए 99 नंबर का ग्रुप हाउसिंग भूखंड दे किया। छह कंपनियों ने आवदेन किए थे लेकिन फ्लेक्स को लेटरपैड पर आवंटन कर दिया था। नियमों की धज्जियां उड़ा कर गलत सूचनाएं देने और अनुमति देने का काम नीरा ने किया था।

नोएडा भूमि घोटाले में नवंबर 2012 में उत्तरप्रदेश की पूर्व मुख्य सचिव नीरा यादव और आईएएस राजीव कुमार को विशेष सीबीआई अदालत के जज एस लाल ने ने तीन-तीन साल की कैद की सजा दी। दोनों पर एक लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया। 1971 बैच की आईएएस अधिकारी नीरा 1995 में नोएडा की मुख्य कार्यकारी अधिकारी थीं और नियमों का उल्लंघन कर एक उद्योगपति को बेशकीमती भूखंड दिया था। सीबीआई ने आरोप लगाया था कि नीरा ने भूमि उपयोग बदलने के लिए तत्कालीन उप मुख्य कार्यकारी अधिकारी राजीव से मिल कर साजिश रची और उसका क्षेत्रफल भी बढ़ाया था। यह भूमि अतिथि गृह के लिए थी। उन पर यह भी आरोप लगा कि नोएडा अध्यक्ष पद का दुरूपयोग कर खुद के लिए भी भूखंड आवंटित करवाया था।

Tuesday, May 21, 2013

भूखंड घोटालों का नोएडा-3

सिंचाई विभाग की अरबों की जमीन बिक्री घोटाला
जून 2012 में सिंचाई मंत्री शिवपाल यादव ने माया सरकार द्वारा सिंचाई विभाग की जमीन बिल्डरों को बेचने की जांच के आदेश दिए। श्री शिवपाल के मुताबिक नोएडा अथॉरिटी ने सिंचाई विभाग की लगभग 20 हजार करोड़ रुपए कीमत की जमीन बिल्डरों को कौडि़यों के दाम बेच दी। ये जमीनें नोएडा को माया सरकार ने स्थानांतरित की थीं।

शिवपाल ने विधानसभा में जानकारी दी कि सिंचाई विभाग की जमीन वापस लेंगे और आरोपियों को जेल भेजेंगे। शिवपाल ने माया के चहेते अफसरान नोएडा अथॉरिटी के तत्कालीन अध्यक्ष मोहिंदर सिंह और सीईओ कैप्टन एसके द्विवेदी के नाम लिए बिना आरोप लगाए कि पहली नजर में लगता है कि घोटाले में ये शामिल थे। दोषी चाहे किसी पार्टी से क्यों न हो, उन्हें बख्शा नहीं जाएगा।

शिवपाल ने आरोप लगाया कि घोटालेबाजों पर तत्कालीन सिंचाई मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी और मुख्यमंत्री मायावती का वरदहस्त था।

Monday, May 13, 2013

भूखंड घोटालों का नोएडा-2


फॉर्म हाउस घोटाला माया-राज का

नोएडा में आवंटित करीब डेढ सौ फार्म हाउस की जमीन के सिलसिले में एक बड़ा घोटाला सितंबर 2012 में सामने आया। यूपी सरकार ने इसकी जांच के आदेश दिए लेकिन जांच है कि गोल-गोल घूम रही है। इसकी जांच हुई भी, घोटाले की प्रारंभिक जांच पूरी भी हुई, प्राधिकरण अध्यक्ष राकेश बहादुर ने शासन को रपट भेज भी दी, आवंटन में अनियमितताओं के साक्ष्य मिलने की बात भी कही, लेकिन आगे कुछ हुआ नहीं।

नोएडा में मायावती सरकार ने 2009-10 और 2010-11 में फार्म हाउस योजना के लिए 12 गावों के किसानों की उपजाऊ जमीनें अधिगृहित कर दस-दस हजार वर्ग मीटर के डेढ़ सौ भूखंड सस्ती दरों पर कंपनियों और रसूखदारों को दे दिए।

आरोप है कि अपने खासमखास औऱ चहेतों की तिजोरियां भरने के लिए सरकारी तिजोरी को अरबों रुपए का चूना इन घोटालेबाजों ने लगाया है। मई में औद्योगिक विकास आयुक्त अनिल कुमार गुप्ता को घोटाले की जांच के लिए सरकार ने भेजा। उनकी रपट पर सरकार ने नोएडा प्राधिकरण के अध्यक्ष राकेश बहादुर सिंह से प्रारंभिक जांच करवाई। उन्हें घोटाले के जिम्मेदार अफसरान के नाम भी सामने लाने की जिम्मेदारी दी थी।

जांच में यह साफ हो गया कि प्राधिकरण के मास्टर प्लान के तहत खेती की जमीन सुनियोजित औद्योगिक विकास के नाम पर हासिल की गई लेकिन मानकों की अनदेखी कर कंपनियों ने मनचाहे और बेतरतीब निर्माण किए। जिन्हें जमीन दी गई, उनमें कई मायावती सरकार के करीबी थे। ऐसी कंपनियों को जमीन दी जो सरकार के खासमखास उद्योगपतियों की थीं।

Thursday, May 2, 2013

भूखंड घोटालों का नोएडा-1

लीज बैक घोटाला 3,800 करोड़ का


दिसंबर 2012 में नोएडा के घोटालों की सूची में 3,800 करोड़ रुपए का एक और मामला जुड़ गया। लीज बैक के नाम पर 2011 में हुए घोटाले में तीन लाख 81 हजार वर्ग मीटर से अधिक जमीन नियम दरकिनार कर बाहरी लोगों समेत तीन निजी कंपनियों के नाम की गईं। विभागीय जांच में पता चला कि गांव के गैर-निवासी व निजी कंपनियों को 175 वर्गमीटर से 15,340 वर्गमीटर के भूखंडों की लीज बैक की गई। एक्सप्रेस-वे पर शाहदरा गांव के पास से सटे सेक्टर 140, 141, 142143 की स्थित जमीन को लीज बैक नियमों का उल्लंघन करने के मामले में इस मामले में नोएडा अथॉरिटी के तत्कालीन सचिव हरीश चंद्र, तहसीलदार अजय श्रीवास्तव और नायब तहसीलदार मनोज कुमार आरोपी हैं।

क्या है लीज बैक
प्राधिकरण के अधिसूचित क्षेत्र में किसानों की जमीन कई बार बिना सर्वेक्षण किए सिर्फ कागजों पर अफसरान अधिगृहीत करते हैं। अधिग्रहण की धारा - चार के मुताबिक अधिगृहीत जमीन पर पहले से अगर आबादी है या दस्तावेजों में आबादी दर्ज है तो इसे प्राधिकरण वापस किसान को देता है। जमीन की यही लीज वापसी की प्रक्रिया लीज बैक कहलाती है।  

लीज बैक के नियमों का अफसरान ने किया कुछ इस तरह से उल्लंघन जिससे कि गांव के किसान बिना एक पैसा मुआवजा पाए ही अपनी जमीनों से बेदखल हो गए थे। कायदे से तो गांव के किसानों के नाम ही लीज बैक होनी थी। गांव के बाहरी लोगों को लीज बैक नहीं हो सकती है। लीज बैक में किसानों के एक परिवार के नाम पर अधिकतम 450 वर्ग मीटर जमीन दी जा सकती है। लेकिन सच तो यह है कि कुछ बाहरी लोगों और तीन निजी कंपनियों के नाम एकमुश्त लीज बैक की गई, जिससे उन्होंने करोड़ों रुपए के वारे-न्यारे कर लिए थे।

ऐसे हुआ लीज बैक घोटाला
24 अप्रैल 2010 को जारी आदेश के तहत गठित दो समितियों ने जांच के बाद यह नहीं बताया कि कितनी जमीन की लीज बैक होगी। दोनों समितियों की रपट में यह तथ्य भी अफसरान ने छुपाया कि लीज बैक का लाभ निजी कंपनियों को होने वाला है। आबादी नियमावली के तीसरे संशोधन के प्रावधानों के आधार पर दोनों समितियों ने रपट में 12 सितंबर व 21 सितंबर 2011 को दी जबकि नियमावली में तीसरा संशोधन 18 नवंबर 2011 को हुआ था। लीज बैक की स्वीकृति देते हुए सात अक्टूबर 2011 को कंपनियों के पक्ष में लीज डीड भी हो गईं। डीएम व एसएसपी की अध्यक्षता वाली समिति ने लीज बैक के लिए की अनुशंसा का पालन नहीं किया। 

लीज बैक इस आधार पर की गई कि हाईकोर्ट से प्राधिकरण के खिलाफ मुकदमे हारने के बाद जमीन के मालिक किसानों ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष रिट याचिका की थी, जिसमें प्राधिकरण के विरुद्ध आदेश होने की संभावना जताई गई थी। किसानों की 450 वर्ग मीटर तक के आबादी क्षेत्रफल को 30 जून 2011 तक के निर्माण के आधार पर नियमित करने की व्यवस्था है लेकिन गांव शाहदरा के अनिवासी और निजी कंपनियों को 175 मीटर से 15,340 वर्ग मीटर तक के भूखंडों की लीज बैक करने में अफसरान ने खुल कर नियमों का उल्लंघन किया। जो जमीन लीज बैक की, वहां पुरानी आबादी का कोई पक्का सबूत दस्तावेजों में नहीं है।  

12 सितंबर व 21 सितंबर 2011 को हुई दोनों समितियों की बैठक की कोई सूचना सदस्यों को नहीं भेजी थी, न ही मीटिंग एजेंडा दस्तावेजों में दिखता है। 12 सितंबर व 21 सितंबर 2011 की समिति बैठकों में एडीएम न तो आए थे, न हस्ताक्षर किए, जबकि चमत्कारिक रूप से समिति की बैठक के बाद तैयार मिनट्स में एडीएम उपस्थित दिखाए जाते हैं। 12 सितंबर 2011 की बैठक में चीफ आर्किटेक्ट एंड सिटी नियोजक नहीं आए थे, न हस्ताक्षर किए, लेकिन जब बैठक के मिनट्स सामने आए तो वे उपस्थित दिख रहे थे।